قَوْمٌ مِّن قَبْلِكُمْ: तुमसे पहले के कुछ लोगों ने।
ثُمَّ أَصْبَحُوا بِهَا كَافِرِينَ: फिर वे उसी (सवाल या उसके उत्तर में मिले हुक्म) के इनकार करने वाले बन गए।
तफसीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपने नबी ﷺ और उम्मत को नसीहत कर रहे हैं कि ऐसे सवाल पूछने से बचो, जिनके बारे में हुक्म न आया हो, क्योंकि तुमसे पहले की क़ौमों ने भी ऐसे ही सवाल अपने नबियों से पूछे थे। जब उन्हें उन सवालों के जवाब में कोई हुक्म दिया गया, तो उन्होंने उसे मानने से इनकार कर दिया और उस पर अमल नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि वे उसी चीज़ के काफ़िर बन गए, जिसके बारे में उन्होंने खुद पूछा था। मिसाल के तौर पर, समूद की क़ौम ने नबी सालिह से ऊँटनी का सवाल किया, और जब वह आई तो उन्होंने उसे काट डाला। इसी तरह हज़रत ईसा की उम्मत ने माँगी हुई दावत (माइदा) के बाद उसे झुठलाया और उसके हुक्म की नाफ़रमानी की। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे उन चीज़ों के बारे में सवाल न करें जिन्हें अल्लाह ने माफ़ कर दिया है या जिन पर सुकूत इख्तियार किया गया है, क्योंकि सवाल करने से हुक्म सख्त हो सकता है और फिर उस पर अमल न करना इनकार की शक्ल अख्तियार कर लेता है।
फ़ायदे (सबक):
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दीन में उन चीज़ों के बारे में बेवजह सवाल नहीं करने चाहिए जिनका हुक्म अल्लाह ने नहीं बताया, क्योंकि इल्म बढ़ने के बजाय ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है।
यह हमें अपने नबी ﷺ की शिक्षाओं पर अमल करने की तरग़ीब देती है कि जो हुक्म मिले, उसे बिना किसी हिचकिचाहट के मानना चाहिए, वरना अंजाम बुरा होता है।
यह आयत मुसलमानों को पहले की क़ौमों के अंजाम से डराती है और उन्हें सब्र, तस्लीम और रज़ा की तालीम देती है, ताकि वे उन्हीं रास्तों पर न चलें जिन पर चलकर पहले वाले हलाक हुए।
इसमें अल्लाह की रहमत की झलक है कि उसने हमारे दीन को आसान बनाया है और अनावश्यक सवालों से बचने की हिदायत देकर हम पर बोझ कम किया है। यह हमें इस्लाम की आसानी और कामयाबी की राह दिखाता है।
(ऐ रसूल) कह दो कि नापाक (हराम) और पाक (हलाल) बराबर नहीं हो सकता अगरचे नापाक की कसरत तुम्हें भला क्यों न मालूम हो तो ऐसे अक्लमन्दों अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम कामयाब रहो
ऐ ईमान वालों ऐसी चीज़ों के बारे में (रसूल से) न पूछा करो कि अगर तुमको मालूम हो जाए तो तुम्हें बुरी मालूम हो और अगर उनके बारे में कुरान नाज़िल होने के वक्त पूछ बैठोगे तो तुम पर ज़ाहिर कर दी जाएगी (मगर तुमको बुरा लगेगा जो सवालात तुम कर चुके) ख़ुदा ने उनसे दरगुज़र की और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला बुर्दबार है
फिर (जब बरदाश्त न हो सका तो) उसके मुन्किर हो गए ख़ुदा ने न तो कोई बहीरा (कान फटी ऊँटनी) मुक़र्रर किया है न सायवा (साँढ़) न वसीला (जुडवा बच्चे) न हाम (बुढ़ा साँढ़) मुक़र्रर किया है मगर कुफ्फ़ार ख़ुदा पर ख्वाह मा ख्वाह झूठ (मूठ) बोहतान बाँधते हैं और उनमें के अक्सर नहीं समझते
और जब उनसे कहा जाता है कि जो (क़ुरान) ख़ुदा ने नाज़िल फरमाया है उसकी तरफ और रसूल की आओ (और जो कुछ कहे उसे मानों तो कहते हैं कि हमने जिस (रंग) में अपने बाप दादा को पाया वही हमारे लिए काफी है क्या (ये लोग लकीर के फकीर ही रहेंगे) अगरचे उनके बाप दादा न कुछ जानते ही हों न हिदायत ही पायी हो
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