अल-माइदा · 87/120
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-माइदा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ ۝٨٧
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tuharrimoo taiyibaati maaa ahallal laahu lakum wa laa ta`tadooo; innal laaha laa yuhibbul mu`tadeen
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदार जो पाक चीज़े ख़ुदा ने तुम्हारे वास्ते हलाल कर दी हैं उनको अपने ऊपर हराम न करो और हद से न बढ़ो क्यों कि ख़ुदा हद से बढ़ जाने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • طَيِّبَاتِ (तय्यिबात): वे पवित्र और उत्तम चीज़ें जिन्हें अल्लाह ने हलाल किया है।
  • لَا تَعْتَدُوا (ला त'तदू): हद से आगे न बढ़ो, अल्लाह की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन मत करो।
  • الْمُعْتَدِينَ (अल-मु'तदीन): हद से बढ़ने वाले, सीमाओं का उल्लंघन करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालों! अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो पवित्र और उत्तम चीज़ें हलाल की हैं—जैसे अच्छे खाने-पीने की वस्तुएँ, स्वच्छ पेय, और वैध विवाह—उन्हें हराम मत ठहराओ। कुछ लोग अत्यधिक ज़ुह्द (तपस्या) या कठोरता के कारण अपने ऊपर हलाल चीज़ों को प्रतिबंधित कर लेते थे, जैसे मांस, मीठी चीज़ें, या स्त्रियों से दूरी बनाना। यह अल्लाह की ओर से दी गई नेमतों को ठुकराना है और उसकी विधान में अनुचित हस्तक्षेप है। अल्लाह ने जो हलाल किया है, उसे हराम करना या उससे परहेज़ करना धर्म का हिस्सा नहीं है।

साथ ही, अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन मत करो—न हलाल को हराम बनाकर और न हराम को हलाल ठहराकर। जो लोग अपनी मनमानी से अल्लाह के कानून में बदलाव करते हैं या उसकी निर्धारित सीमाओं से आगे बढ़ते हैं, अल्लाह उन्हें पसंद नहीं करता। वास्तव में, वह ऐसे लोगों से घृणा करता है और उन्हें अपने प्रेम से वंचित रखता है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. इस्लाम एक आसान और संतुलित धर्म है। अल्लाह ने जो हलाल किया है, उसमें भलाई और आराम है। उसे त्यागना या हराम ठहराना अल्लाह की नेमतों की नाशुक्री है।
  2. धर्म में कठोरता और अतिशयता (ग़ुलू) इस्लामी शिक्षा के विपरीत है। नबी ﷺ ने भी ऐसे लोगों से बचने की ताकीद की है जो हद से बढ़ जाते हैं।
  3. अल्लाह की सीमाओं का सम्मान करना ही सच्ची ईमानदारी है। हलाल को हलाल और हराम को हराम मानना ही मोमिन का कर्तव्य है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत और उसके दिए गए अच्छे पदार्थों का आनंद लेना चाहिए, बशर्ते वे जायज़ हों। इससे जीवन में खुशी और शुक्र की भावना पैदा होती है।
  5. अल्लाह की नाराज़गी से बचने का रास्ता यह है कि हम उसकी निर्धारित सीमाओं पर अमल करें और अपनी इच्छाओं को शरीयत के आगे समर्पित करें।


📜 आयत 85-89 — सूरा अल-माइदा

85فَأَثَابَهُمُ اللَّهُ بِمَا قَالُوا جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْمُحْسِنِينَ
तो ख़ुदा ने उन्हें उनके (सदक़ दिल से) अर्ज़ करने के सिले में उन्हें वह (हरे भरे) बाग़ात अता फरमाए जिनके (दरख्तों के) नीचे नहरें जारी हैं (और) वह उसमें हमेशा रहेंगे और (सदक़ दिल से) नेकी करने वालों का यही ऐवज़ है
86وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ
और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया यही लोग जहन्नुमी हैं
87يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ
ऐ ईमानदार जो पाक चीज़े ख़ुदा ने तुम्हारे वास्ते हलाल कर दी हैं उनको अपने ऊपर हराम न करो और हद से न बढ़ो क्यों कि ख़ुदा हद से बढ़ जाने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
88وَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ حَلَالًا طَيِّبًا ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي أَنتُم بِهِ مُؤْمِنُونَ
और जो हलाल साफ सुथरी चीज़ें ख़ुदा ने तुम्हें दी हैं उनको (शौक़ से) खाओ और जिस ख़ुदा पर तुम ईमान लाए हो उससे डरते रहो
89لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا عَقَّدتُّمُ الْأَيْمَانَ ۖ فَكَفَّارَتُهُ إِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاكِينَ مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ ۖ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ ۚ ذَٰلِكَ كَفَّارَةُ أَيْمَانِكُمْ إِذَا حَلَفْتُمْ ۚ وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
ख़ुदा तुम्हारे बेकार (बेकार) क़समों (के खाने) पर तो ख़ैर गिरफ्तार न करेगा मगर बाक़सद (सच्ची) पक्की क़सम खाने और उसके ख़िलाफ करने पर तो ज़रुर तुम्हारी ले दे करेगा (लो सुनो) उसका जुर्माना जैसा तुम ख़ुद अपने एहलोअयाल को खिलाते हो उसी क़िस्म का औसत दर्जे का दस मोहताजों को खाना खिलाना या उनको कपड़े पहनाना या एक गुलाम आज़ाद करना है फिर जिससे यह सब न हो सके तो मैं तीन दिन के रोज़े (रखना) ये (तो) तुम्हारी क़समों का जुर्माना है जब तुम क़सम खाओ (और पूरी न करो) और अपनी क़समों (के पूरा न करने) का ख्याल रखो ख़ुदा अपने एहकाम को तुम्हारे वास्ते यूँ साफ़ साफ़ बयान करता है ताकि तुम शुक्र करो
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीअवतरण स्थान
87आयत

अनुवाद — अल-माइदा 87

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Monday, September 28, 2026

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