अन-नज्म · 38/62
अनुवाद उच्चारण — अन-नज्म
أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۝٣٨
Allaa taziru waaziratunw wizra ukhraa
📖 हिंदी अर्थ
जिन्होने (अपना हक़) (पूरा अदा) किया इन सहीफ़ों में ये है, कि कोई शख़्श दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • तज़िरु (तो वज़्न उठाए): गुनाह का बोझ उठाना।
  • वाज़िरतुन (बोझ उठाने वाली): गुनाहगार आत्मा।
  • विज़्रन (बोझ): गुनाह या पाप का भार।
  • उख़्रा (दूसरी): कोई और आत्मा।

तफ़सीर:

इस आयत में अल्लाह तआला ने यह स्पष्ट घोषणा की है कि कोई भी आत्मा किसी दूसरी आत्मा का गुनाह नहीं उठाएगी। हर इंसान अपने किए का खुद ज़िम्मेदार है। अगर कोई व्यक्ति गुनाह करता है, तो उसका बोझ सिर्फ उसी पर होगा, न उसके माँ-बाप पर, न उसके बच्चों पर, न उसके रिश्तेदारों पर, और न ही उसके दोस्तों पर। यह अल्लाह का बिल्कुल न्यायपूर्ण क़ानून है।

इसी तरह, इंसान को उसके अच्छे कर्मों का फल भी सिर्फ उसी को मिलेगा। जो नेकी वह खुद करेगा, उसका अज्र (इनाम) उसे मिलेगा, और जो बुराई वह खुद करेगा, उसकी सज़ा भी उसे ही भुगतनी होगी। यह आयत हमें यह सिखाती है कि हमें अपने आचरण की ज़िम्मेदारी खुद लेनी चाहिए, और किसी दूसरे के गुनाह का बोझ अपने ऊपर लादने या किसी और पर अपने गुनाह का इल्ज़ाम लगाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

यह एक बहुत बड़ी न्यायपूर्ण और रहमत भरी शिक्षा है। अल्लाह तआला ने यह बात पहले की किताबों (मूसा और इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सहीफों) में भी दर्ज की थी, और अब क़ुरआन में भी इसे दोहराया है, ताकि हमें यक़ीन हो जाए कि अल्लाह का दीन हमेशा से इंसाफ़ और हक़ पर आधारित रहा है।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपनी ज़िंदगी में नेकी और परहेज़गारी अपनानी चाहिए, क्योंकि हमारा भला या बुरा अंजाम हमारे अपने कर्मों पर निर्भर है। अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, और न ही किसी का बोझ किसी और पर डालता है। यह हमारे लिए रहमत और इंसाफ़ की बात है कि हमें अपने कर्मों का फल मिलेगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। इसलिए हमें चाहिए कि हम अच्छे कर्म करें, गुनाहों से बचें, और अल्लाह की रहमत और मग़फिरत के तलबगार रहें।



📜 आयत 36-40 — अन-नज्म

36أَمْ لَمْ يُنَبَّأْ بِمَا فِي صُحُفِ مُوسَىٰ
क्या उसको उन बातों की ख़बर नहीं पहुँची जो मूसा के सहीफ़ों में है
37وَإِبْرَاهِيمَ الَّذِي وَفَّىٰ
और इबराहीम के (सहीफ़ों में)
38أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ
जिन्होने (अपना हक़) (पूरा अदा) किया इन सहीफ़ों में ये है, कि कोई शख़्श दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा
39وَأَن لَّيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
और ये कि इन्सान को वही मिलता है जिसकी वह कोशिश करता है
40وَأَنَّ سَعْيَهُ سَوْفَ يُرَىٰ
और ये कि उनकी कोशिश अनक़रीेब ही (क़यामत में) देखी जाएगी
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अनुवाद — अन-नज्म 38

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Tuesday, August 18, 2026

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