अल-क़मर · 29/55
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़मर
فَنَادَوْا صَاحِبَهُمْ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ ۝٢٩
Fanaadaw saahibahum fata`aataa fa`aqar
📖 हिंदी अर्थ
तो उन लोगों ने अपने रफीक़ (क़ेदार) को बुलाया तो उसने पकड़ कर (ऊँटनी की) कूंचे काट डालीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَنَادَوْا – उन्होंने पुकारा
  • صَاحِبَهُمْ – अपने साथी को
  • فَتَعَاطَى – तो उसने (हथियार) उठाया या हाथ बढ़ाया
  • فَعَقَرَ – तो उसने (ऊँटनी को) काट डाला / मार डाला

तफ़सीर (व्याख्या):

जब समूद की क़ौम के सरकश लोगों ने अल्लाह के नबी सालेह अलैहिस्सलाम की निशानी (चमत्कारिक ऊँटनी) को देखा, तो उनके दिलों में ईर्ष्या और विद्रोह की आग भड़क उठी। उन्होंने आपस में साज़िश रची और अपने सबसे बदकार और सरकश साथी को पुकारा, ताकि वह उस ऊँटनी को मार डाले। वह व्यक्ति अपनी शरारत और बुराई में आगे बढ़ा, उसने अपनी तलवार उठाई और उस ऊँटनी को काट डाला। यह कृत्य उनके कुफ़्र और अल्लाह की निशानियों से मुँह मोड़ने की अंतिम सीमा थी।

इस आयत में अल्लाह तआला उस क़ौम के हाल को बयान कर रहा है जिसने अपने नबी की दावत को ठुकराया और अल्लाह की निशानी को नष्ट कर दिया। उन्होंने सोचा कि यह ऊँटनी उनके लिए मुसीबत है, लेकिन असल मुसीबत उनके अपने कर्मों से आने वाली थी। यह घटना हमें सिखाती है कि जब इंसान अपनी सरकशी और हठधर्मी पर अड़ जाता है, तो वह अल्लाह की सबसे बड़ी निशानियों को भी नकार देता है और अपने अंजाम की परवाह नहीं करता।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह की निशानियों और उसके दीन के प्रति बुराई करने वालों का अंजाम बहुत भयानक होता है। जिस तरह समूद की क़ौम ने ऊँटनी को काटकर अल्लाह के अज़ाब को बुलाया, उसी तरह आज भी जो लोग अल्लाह की आयतों और उसके रसूल की शिक्षाओं का मज़ाक उड़ाते हैं या उन्हें नष्ट करने की कोशिश करते हैं, वे अपने लिए बर्बादी का सामान करते हैं।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह क़िस्सा हमें चेतावनी देता है कि हम अपने दिलों को अल्लाह के ज़िक्र और उसकी निशानियों के प्रति नरम रखें। कभी किसी नेक काम में रुकावट न डालें और न ही अल्लाह के दीन के खिलाफ किसी साज़िश में शामिल हों। अल्लाह की रहमत उन्हीं के लिए है जो उसकी निशानियों का सम्मान करते हैं और अपने नबी की सुन्नत पर चलते हैं। याद रखें, अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, और वह अपने बंदों की हर हरकत को देख रहा है। आइए, हम उन लोगों की तरह न बनें जिन्होंने अल्लाह की नेमतों को नकारा और फिर पछतावे के सिवा कुछ हाथ न आया।



📜 आयत 27-31 — सूरा अल-क़मर

27إِنَّا مُرْسِلُو النَّاقَةِ فِتْنَةً لَّهُمْ فَارْتَقِبْهُمْ وَاصْطَبِرْ
(ऐ सालेह) हम उनकी आज़माइश के लिए ऊँटनी भेजने वाले हैं तो तुम उनको देखते रहो और (थोड़ा) सब्र करो
28وَنَبِّئْهُمْ أَنَّ الْمَاءَ قِسْمَةٌ بَيْنَهُمْ ۖ كُلُّ شِرْبٍ مُّحْتَضَرٌ
और उनको ख़बर कर दो कि उनमें पानी की बारी मुक़र्रर कर दी गयी है हर (बारी वाले को अपनी) बारी पर हाज़िर होना चाहिए
29فَنَادَوْا صَاحِبَهُمْ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ
तो उन लोगों ने अपने रफीक़ (क़ेदार) को बुलाया तो उसने पकड़ कर (ऊँटनी की) कूंचे काट डालीं
30فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ
तो (देखो) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
31إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ صَيْحَةً وَاحِدَةً فَكَانُوا كَهَشِيمِ الْمُحْتَظِرِ
हमने उन पर एक सख्त चिंघाड़ (का अज़ाब) भेज दिया तो वह बाड़े वालो के सूखे हुए चूर चूर भूसे की तरह हो गए
अल-क़मरकुरान सूची
55आयत
मक्कीअवतरण स्थान
29आयत

अनुवाद — अल-क़मर 29

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Thursday, October 1, 2026

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