Wa in tuti` aksara man fil ardi yudillooka `an sabeelil laah; iny yattabi`oona illaz zanna wa in hum illaa yakhrusoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) दुनिया में तो बहुतेरे लोग ऐसे हैं कि तुम उनके कहने पर चलो तो तुमको ख़ुदा की राह से बहका दें ये लोग तो सिर्फ अपने ख्यालात की पैरवी करते हैं और ये लोग तो बस अटकल पच्चू बातें किया करते हैं
🌐 Additional reference in اردو
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اور اکثر لوگ جو زمین پر آباد ہیں (گمراہ ہیں) اگر تم ان کا کہا مان لو گے تو وہ تمہیں خدا کا رستہ بھلا دیں گے یہ محض خیال کے پیچھے چلتے اور نرے اٹکل کے تیر چلاتے ہیں
سَبِيلِ اللَّهِ: अल्लाह का मार्ग, यानी इस्लाम का दीन।
الظَّنَّ: अटकल, बिना प्रमाण के अनुमान लगाना।
يَخْرُصُونَ: वे झूठ बोलते हैं, अंदाज़े से बातें कहते हैं, या झूठी बातें गढ़ते हैं।
तफसीर (व्याख्या):
ऐ नबी! अगर तुम धरती के अधिकतर लोगों की बात मान लो, तो वे तुम्हें अल्लाह के दीन से भटका देंगे। यह बात उन काफिरों और मुशरिकों के बारे में है जो बहुसंख्यक हैं, लेकिन उनकी बहुतायत का कोई महत्व नहीं, क्योंकि सत्य हमेशा अल्पसंख्यकों के साथ रहा है। अल्लाह की सुन्नत (रीति) यही है कि हक़ और सच्चाई को कम लोग ही अपनाते हैं।
ये लोग किसी ठोस ज्ञान या प्रमाण पर नहीं चलते, बल्कि केवल अपने अंदाज़ों और अटकलों का अनुसरण करते हैं। उन्होंने यह अनुमान लगा लिया है कि उनके बुज़ुर्ग और पूर्वज जिस रास्ते पर थे, वही सही है, और उनके ये देवी-देवता उन्हें अल्लाह के करीब कर देंगे। यह सब उनकी झूठी बातें और मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं। वे केवल भ्रम और धोखे में हैं।
शिक्षाएँ और लाभ:
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य की कसौटी बहुमत नहीं है। किसी बात के सही होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि अधिकतर लोग उसे मानते हों। हमें हमेशा क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में ही फैसला करना चाहिए, चाहे लोग कितने भी हों।
अल्लाह का मार्ग एक ही है और वह सीधा है। जो लोग इस मार्ग से भटकते हैं, वे अपनी अटकलों और अनुमानों के पीछे चलते हैं। हमें अपने दीन में अटकलों और बिना प्रमाण के बातों से बचना चाहिए।
यह आयत हमें सच्चाई पर स्थिर रहने की ताकत देती है, भले ही हम अकेले हों या अल्पसंख्यक हों। अल्लाह का साथ सच्चे लोगों के साथ होता है, चाहे वे कितने ही कम क्यों न हों।
हमें अपने धर्म और विश्वास में अंधी परंपराओं और पूर्वजों की नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि ज्ञान और प्रमाण के आधार पर ही चलना चाहिए। अल्लाह ने हमें अक्ल और समझ दी है ताकि हम सत्य को पहचानें।
यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि वे अपने नबी की शिक्षाओं पर चलें, न कि बहुसंख्यक लोगों की राय पर, क्योंकि अधिकतर लोग सत्य से दूर होते हैं और केवल अपनी इच्छाओं और भ्रमों का पालन करते हैं।
और (ऐ रसूल) दुनिया में तो बहुतेरे लोग ऐसे हैं कि तुम उनके कहने पर चलो तो तुमको ख़ुदा की राह से बहका दें ये लोग तो सिर्फ अपने ख्यालात की पैरवी करते हैं और ये लोग तो बस अटकल पच्चू बातें किया करते हैं
और ताकि जो लोग इफ़तेरा परदाज़ियाँ ये लोग ख़ुद करते हैं वह भी करने लगें (क्या तुम ये चाहते हो कि) मैं ख़ुदा को छोड़ कर किसी और को सालिस तलाश करुँ हालॉकि वह वही ख़ुदा है जिसने तुम्हारे पास वाज़ेए किताब नाज़िल की और जिन लोगों को हमने किताब अता फरमाई है वह यक़ीनी तौर पर जानते हैं कि ये (कुरान भी) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से बरहक़ नाज़िल किया गया है
तो तुम (कहीं) शक़ करने वालों से न हो जाना और सच्चाई और इन्साफ में तो तुम्हारे परवरदिगार की बात पूरी हो गई कोई उसकी बातों का बदलने वाला नहीं और वही बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है
और (ऐ रसूल) दुनिया में तो बहुतेरे लोग ऐसे हैं कि तुम उनके कहने पर चलो तो तुमको ख़ुदा की राह से बहका दें ये लोग तो सिर्फ अपने ख्यालात की पैरवी करते हैं और ये लोग तो बस अटकल पच्चू बातें किया करते हैं
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