Wa kaz zaba bihee qawmuka wa huwal haqq; qul lastu`alaikum biwakeel
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और उसी (क़ुरान) को तुम्हारी क़ौम ने झुठला दिया हालॉकि वह बरहक़ है (ऐ रसूल) तुम उनसे कहो कि मैं तुम पर कुछ निगेहबान तो हूं नहीं हर ख़बर (के पूरा होने) का एक ख़ास वक्त मुक़र्रर है और अनक़रीब (जल्दी) ही तुम जान लोगे
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اور اس (قرآن) کو تمہاری قوم نے جھٹلایا حالانکہ وہ سراسر حق ہے۔ کہہ دو کہ میں تمہارا داروغہ نہیں ہوں
हे नबी! आपकी क़ौम के काफ़िरों ने इस क़ुरआन को झुठलाया, हालाँकि यह क़ुरआन सत्य है और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह अल्लाह की ओर से उतरा है। यह अपने हर उस आदेश, हर उस समाचार और हर उस शिक्षा में सच्चा है जो इसमें बयान की गई है। इसे झुठलाने वालों का झुठलाना इसकी सत्यता पर कोई प्रभाव नहीं डालता।
फिर अल्लाह तआला नबी ﷺ को निर्देश देता है कि आप इन लोगों से कहें: "मैं तुम पर कोई संरक्षक या निरीक्षक नियुक्त नहीं हूँ। मेरा काम केवल अल्लाह का संदेश पहुँचाना है। मैं तुम्हें सचेत करने वाला हूँ, तुम्हें ज़बरदस्ती ईमान लाने पर मजबूर करने वाला नहीं हूँ। मेरी ज़िम्मेदारी केवल प्रचार और चेतावनी है, जबकि हिसाब लेने वाला अल्लाह ही है।"
फ़ायदे (लाभ):
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य को झुठलाने वालों की संख्या या उनका विरोध कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्य हमेशा सत्य ही रहता है। सत्य की पहचान उसे मानने वालों की संख्या से नहीं होती।
दावत और प्रचार का कार्य करने वाले व्यक्ति को केवल संदेश पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है, परिणाम अल्लाह के हाथ में है। इससे दावत देने वालों को धैर्य और साहस मिलता है।
इस्लाम में ज़बरदस्ती का कोई स्थान नहीं है। ईमान दिल की बात है, जो केवल अल्लाह की मर्ज़ी से आता है। हमारा काम केवल सत्य को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना है।
नबी ﷺ की नम्रता और विनम्रता दिखाई देती है कि उन्होंने अपने ऊपर कोई अधिकार नहीं जताया, बल्कि अपने को केवल संदेशवाहक और सचेत करने वाला बताया। यह हमारे लिए आदर्श है कि हम भी दूसरों के साथ नम्रता और विनम्रता से पेश आएँ।
यह आयत हमें सिखाती है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों के लिए स्वयं ज़िम्मेदार है। हम किसी को ईमान पर मजबूर नहीं कर सकते, बल्कि केवल अच्छे आचरण और स्पष्ट संदेश के माध्यम से उसे राह दिखा सकते हैं।
और उसी (क़ुरान) को तुम्हारी क़ौम ने झुठला दिया हालॉकि वह बरहक़ है (ऐ रसूल) तुम उनसे कहो कि मैं तुम पर कुछ निगेहबान तो हूं नहीं हर ख़बर (के पूरा होने) का एक ख़ास वक्त मुक़र्रर है और अनक़रीब (जल्दी) ही तुम जान लोगे
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि वही उस पर अच्छी तरह क़ाबू रखता है कि अगर (चाहे तो) तुम पर अज़ाब तुम्हारे (सर के) ऊपर से नाज़िल करे या तुम्हारे पॉव के नीचे से (उठाकर खड़ा कर दे) या एक गिरोह को दूसरे से भिड़ा दे और तुम में से कुछ लोगों को बाज़ आदमियों की लड़ाई का मज़ा चखा दे ज़रा ग़ौर तो करो हम किस किस तरह अपनी आयतों को उलट पुलट के बयान करते हैं ताकि लोग समझे
और उसी (क़ुरान) को तुम्हारी क़ौम ने झुठला दिया हालॉकि वह बरहक़ है (ऐ रसूल) तुम उनसे कहो कि मैं तुम पर कुछ निगेहबान तो हूं नहीं हर ख़बर (के पूरा होने) का एक ख़ास वक्त मुक़र्रर है और अनक़रीब (जल्दी) ही तुम जान लोगे
और जब तुम उन लोगों को देखो जो हमारी आयतों में बेहूदा बहस कर रहे हैं तो उन (के पास) से टल जाओ यहाँ तक कि वह लोग उसके सिवा किसी और बात में बहस करने लगें और अगर (हमारा ये हुक्म) तुम्हें शैतान भुला दे तो याद आने के बाद ज़ालिम लोगों के साथ हरगिज़ न बैठना
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