अल-क़लम · 25/52
अनुवाद उच्चारण — अल-क़लम
وَغَدَوْا عَلَىٰ حَرْدٍ قَادِرِينَ ۝٢٥
Wa ghadaw `alaa hardin qaadireen
📖 हिंदी अर्थ
तो वह लोग रोक थाम के एहतमाम के साथ फल तोड़ने की ठाने हुए सवेरे ही जा पहुँचे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • غَدَوْا (गदव): सुबह-सवेरे निकलना, प्रातःकाल जाना।
  • حَرْدٍ (हर्दिन): रोकना, मना करना, या दृढ़ इरादा। यहाँ इसका अर्थ है फ़क़ीरों (गरीबों) को रोकना और उन्हें फल देने से इनकार करना।
  • قَادِرِينَ (क़ादिरीन): सामर्थ्य रखने वाले, अपनी ताक़त पर भरोसा रखने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये आयत उन बाग़ वालों के क़िस्से का हिस्सा है, जिन्होंने अपने बाग़ के फल ग़रीबों और मिस्कीनों को देने से रोकने का बुरा इरादा किया था। जब उन्होंने सुबह-सवेरे उठकर अपने बाग़ की तरफ़ क़दम बढ़ाया, तो वे अपने इस बुरे इरादे पर अटल थे और उन्हें पूरा यक़ीन था कि वे अपनी ताक़त और तदबीर से इस काम को अंजाम दे सकते हैं। वे सोच रहे थे कि आज कोई ग़रीब उनके बाग़ के पास नहीं फटक सकेगा, और वे अपने फलों पर पूरा क़ब्ज़ा रखेंगे।

उनका ये भरोसा सिर्फ़ उनकी अपनी सोच थी—वे अपनी ताक़त पर इतरा रहे थे, लेकिन उन्हें ये ख़याल नहीं था कि अल्लाह की ताक़त उनकी ताक़त से कहीं बढ़कर है। उन्होंने अपनी योजना को पक्का समझा, मगर अल्लाह ने उनकी साज़िश को नाकाम कर दिया और उनका बाग़ रातों-रात तबाह हो गया। ये उनके लिए एक सबक़ था कि इंसान चाहे कितना ही ताक़तवर और चालाक क्यों न हो, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे उसकी कोई चाल नहीं चलती।

इस आयत से हमें ये सीख मिलती है कि हमें अपनी ताक़त और हैसियत पर घमंड नहीं करना चाहिए। अल्लाह ने जो नेअमतें (अनुग्रह) दी हैं, उनमें दूसरों का हक़ भी होता है। जो लोग अपने माल में ग़रीबों का हिस्सा रोकते हैं, वे दरअसल अल्लाह की नेअमत की क़द्र नहीं करते। अल्लाह तआला ऐसे लोगों को पकड़ता है, और उनकी तदबीरें उनके काम नहीं आतीं।

ये क़िस्सा हमें बताता है कि इस्लाम में सख़ावत (दानशीलता) और ग़रीबों की मदद कितनी अहम है। जब हम दूसरों की मदद करते हैं, तो अल्लाह हमारे रिज़्क़ (आजीविका) में बरकत (वृद्धि) देता है, और जब हम रोकते हैं, तो अल्लाह की पकड़ बहुत सख़्त होती है। आओ, हम अपने माल में अल्लाह का हक़ अदा करें और ग़रीबों की मदद करके अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें। याद रखें, अल्लाह की ताक़त सबसे बड़ी है, और उसकी मर्ज़ी के बिना कोई काम नहीं हो सकता।

🎧 सुनें

📜 आयत 23-27 — अल-क़लम

23فَانطَلَقُوا وَهُمْ يَتَخَافَتُونَ
ग़रज़ वह लोग चले और आपस में चुपके चुपके कहते जाते थे
24أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا الْيَوْمَ عَلَيْكُم مِّسْكِينٌ
कि आज यहाँ तुम्हारे पास कोई फ़क़ीर न आने पाए
25وَغَدَوْا عَلَىٰ حَرْدٍ قَادِرِينَ
तो वह लोग रोक थाम के एहतमाम के साथ फल तोड़ने की ठाने हुए सवेरे ही जा पहुँचे
26فَلَمَّا رَأَوْهَا قَالُوا إِنَّا لَضَالُّونَ
फिर जब उसे (जला हुआ सियाह) देखा तो कहने लगे हम लोग भटक गए
27بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ
(ये हमारा बाग़ नहीं फिर ये सोचकर बोले) बात ये है कि हम लोग बड़े बदनसीब हैं
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अनुवाद — अल-क़लम 25

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Tuesday, August 18, 2026

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