अल-क़लम · 24/52
अनुवाद उच्चारण — अल-क़लम
أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا الْيَوْمَ عَلَيْكُم مِّسْكِينٌ ۝٢٤
Al laa yadkhulannahal yawma `alaikum miskeen
📖 हिंदी अर्थ
कि आज यहाँ तुम्हारे पास कोई फ़क़ीर न आने पाए
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا – कि हरगिज़ न दाखिल हो (इसमें "لَّا" और "نَّ" का प्रयोग ताकीद और पक्के इरादे के लिए है)
  • الْيَوْمَ – आज (इस दिन)
  • عَلَيْكُم – तुम्हारे पास / तुम पर
  • مِسْكِينٌ – कोई गरीब, मोहताज, ज़रूरतमंद

विस्तृत तफ़सीर:

यह आयत उन बाग़ वालों की कहानी का हिस्सा है, जिन्होंने अपने बाग़ के फलों को गरीबों और मोहताजों से बचाने की कसम खाई थी। वे आपस में चुपके-चुपके सलाह कर रहे थे कि आज किसी भी मिस्कीन को इस बाग़ में दाखिल न होने दिया जाए। उन्होंने यह फ़ैसला इसलिए किया कि वे अपनी पैदावार पूरी तरह अपने लिए रखना चाहते थे और गरीबों का हक़ अदा करने से इनकार कर रहे थे।

यह उनकी कंजूसी और दिल की सख्ती की इंतिहा थी। उन्होंने न सिर्फ़ गरीबों को देना बंद किया, बल्कि उनके आने के रास्ते भी बंद कर दिए। उनका इरादा था कि आज कोई गरीब उनके बाग़ के पास भी न फटके। यह उनके नफ़्स की बुराई और दुनियादारी की मोहब्बत की आख़िरी मंज़िल थी।

इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि अल्लाह तआला ने हर माल में गरीबों और ज़रूरतमंदों का हक़ रखा है। जो लोग इस हक़ को अदा नहीं करते और गरीबों से दूर भागते हैं, वह अल्लाह की नेमतों के शुक्रगुज़ार नहीं होते। अल्लाह तआला ऐसे लोगों से नाराज़ होता है और उनकी नेमतें छीन लेता है।

इस कहानी का अंजाम हम आगे की आयात में देखते हैं कि अल्लाह ने उनके बाग़ को रातों-रात तबाह कर दिया। यह हमारे लिए एक बड़ी नसीहत है कि हम अपने माल में से अल्लाह के बंदों का हक़ निकालें, गरीबों की मदद करें और उन्हें अपने घरों और दिलों से दूर न करें। रिज़्क़ में बरकत अल्लाह के हाथ में है, और वह उन्हीं को बरकत देता है जो उसके बंदों के साथ भलाई करते हैं।

इस्लाम हमें सिखाता है कि माल अल्लाह की अमानत है और हम उसके अमीन हैं। जो अमीन अपनी अमानत में ख़ियानत करता है, वह अल्लाह की पकड़ से नहीं बच सकता। आइए हम इस आयत से सबक़ लें और अपने जीवन में सखावत (दानशीलता) और हमदर्दी को अपनाएं, ताकि अल्लाह की रहमत और बरकत हमारे साथ रहे।

🎧 सुनें

📜 आयत 22-26 — अल-क़लम

22أَنِ اغْدُوا عَلَىٰ حَرْثِكُمْ إِن كُنتُمْ صَارِمِينَ
कि अगर तुमको फल तोड़ना है तो अपने बाग़ में सवेरे से चलो
23فَانطَلَقُوا وَهُمْ يَتَخَافَتُونَ
ग़रज़ वह लोग चले और आपस में चुपके चुपके कहते जाते थे
24أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا الْيَوْمَ عَلَيْكُم مِّسْكِينٌ
कि आज यहाँ तुम्हारे पास कोई फ़क़ीर न आने पाए
25وَغَدَوْا عَلَىٰ حَرْدٍ قَادِرِينَ
तो वह लोग रोक थाम के एहतमाम के साथ फल तोड़ने की ठाने हुए सवेरे ही जा पहुँचे
26فَلَمَّا رَأَوْهَا قَالُوا إِنَّا لَضَالُّونَ
फिर जब उसे (जला हुआ सियाह) देखा तो कहने लगे हम लोग भटक गए
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अनुवाद — अल-क़लम 24

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Tuesday, August 18, 2026

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