अल-आराफ · 102/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَمَا وَجَدْنَا لِأَكْثَرِهِم مِّنْ عَهْدٍ ۖ وَإِن وَجَدْنَا أَكْثَرَهُمْ لَفَاسِقِينَ ۝١٠٢
Wa maa wajadnaa li aksarihim min `ahd; wa inw wajadnaaa aksarahum lafaasiqeen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने तो उसमें से अक्सरों का एहद (ठीक) न पाया और हमने उनमें से अक्सरों को बदकार ही पाया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • عَهْدٍ: वचन, प्रतिज्ञा, या वफ़ादारी। यहाँ इसका अर्थ है अल्लाह के साथ किया गया वचन और उसकी आज्ञाओं का पालन करने का संकल्प।
  • لَفَاسِقِينَ: अवज्ञाकारी, आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, सीमा का उल्लंघन करने वाले।

व्याख्या:

इस आयात में अल्लाह तआला बताते हैं कि जब उन्होंने पिछली उम्मतों (समुदायों) की ओर देखा, जिनके पास पैग़म्बर आए थे, तो उनमें से अधिकतर लोगों में अपने वचन और प्रतिज्ञा की पूर्ति नहीं पाई। उन्होंने अल्लाह के साथ किए गए वचन को तोड़ दिया, और उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं किया। अल्लाह ने उनमें से अधिकतर को अवज्ञाकारी और सीमा का उल्लंघन करने वाला पाया, जो सत्य से भटक गए थे और अपनी इच्छाओं के पीछे चल रहे थे। यह उन लोगों की स्थिति का वर्णन है जिन्होंने अल्लाह के रसूलों को झुठलाया और उनके विरुद्ध विद्रोह किया। यहाँ "अधिकतर" का उल्लेख इसलिए किया गया है क्योंकि उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो ईमान लाए और वचन पर कायम रहे, परन्तु वे अल्पसंख्यक थे।

फ़ायदे (लाभ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के साथ किए गए वचन और प्रतिज्ञा को पूरा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें अपने ईमान और इस्लाम के वचन पर सच्चे और स्थिर रहना चाहिए।
  2. यह चेतावनी है कि अवज्ञा और विद्रोह का अंजाम बुरा होता है। जो लोग अल्लाह की आज्ञाओं से मुँह मोड़ते हैं, वे अपना नुक़सान करते हैं।
  3. यह हमें प्रेरित करती है कि हम उन अल्पसंख्यकों में से बनें जो वचन पर कायम रहते हैं, न कि उन बहुसंख्यकों में से जो वचन तोड़ते हैं। सच्चाई और वफ़ादारी पर चलना ही सफलता का मार्ग है।
  4. यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह हर चीज़ को जानता है और वह हमारे कर्मों और नीयतों से अवगत है। इसलिए हमें उसके सामने जवाबदेह होने का एहसास रखना चाहिए और अपने जीवन को उसकी रज़ा (प्रसन्नता) के अनुसार ढालना चाहिए।


📜 आयत 100-104 — अल-आराफ

100أَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ أَهْلِهَا أَن لَّوْ نَشَاءُ أَصَبْنَاهُم بِذُنُوبِهِمْ ۚ وَنَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
क्या जो लोग अहले ज़मीन के बाद ज़मीन के वारिस (व मालिक) होते हैं उन्हें ये मालूम नहीं कि अगर हम चाहते तो उनके गुनाहों की बदौलत उनको मुसीबत में फँसा देते (मगर ये लोग ऐसे नासमझ हैं कि गोया) उनके दिलों पर हम ख़ुद (मोहर कर देते हैं कि ये लोग कुछ सुनते ही नहीं
101تِلْكَ الْقُرَىٰ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنبَائِهَا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا مِن قَبْلُ ۚ كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ الْكَافِرِينَ
(ऐ रसूल) ये चन्द बस्तियाँ हैं जिन के हालात हम तुमसे बयान करते हैं और इसमें तो शक़ ही नहीं कि उनके पैग़म्बर उनके पास वाजेए व रौशन मौजिज़े लेकर आए मगर ये लोग जिसके पहले झुठला चुके थे उस पर भला काहे को ईमान लाने वाले थे ख़ुदा यूं काफिरों के दिलों पर अलामत मुकर्रर कर देता है (कि ये ईमान न लाएँगें)
102وَمَا وَجَدْنَا لِأَكْثَرِهِم مِّنْ عَهْدٍ ۖ وَإِن وَجَدْنَا أَكْثَرَهُمْ لَفَاسِقِينَ
और हमने तो उसमें से अक्सरों का एहद (ठीक) न पाया और हमने उनमें से अक्सरों को बदकार ही पाया
103ثُمَّ بَعَثْنَا مِن بَعْدِهِم مُّوسَىٰ بِآيَاتِنَا إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَظَلَمُوا بِهَا ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ
फिर हमने (उन पैग़म्बरान मज़कूरीन के बाद) मूसा को फिरऔन और उसके सरदारों के पास मौजिज़े अता करके (रसूल बनाकर) भेजा तो उन लोगों ने उन मौजिज़ात के साथ (बड़ी बड़ी) शरारतें की पस ज़रा ग़ौर तो करो कि आख़िर फसादियों का अन्जाम क्या हुआ
104وَقَالَ مُوسَىٰ يَا فِرْعَوْنُ إِنِّي رَسُولٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ
और मूसा ने (फिरऔन से) कहा ऐ फिरऔनमें यक़ीनन परवरदिगारे आलम का रसूल हूँ
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीRevelation
102आयत

अनुवाद — अल-आराफ 102

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Tuesday, August 18, 2026

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