عَهْدٍ: वचन, प्रतिज्ञा, या वफ़ादारी। यहाँ इसका अर्थ है अल्लाह के साथ किया गया वचन और उसकी आज्ञाओं का पालन करने का संकल्प।
لَفَاسِقِينَ: अवज्ञाकारी, आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, सीमा का उल्लंघन करने वाले।
व्याख्या:
इस आयात में अल्लाह तआला बताते हैं कि जब उन्होंने पिछली उम्मतों (समुदायों) की ओर देखा, जिनके पास पैग़म्बर आए थे, तो उनमें से अधिकतर लोगों में अपने वचन और प्रतिज्ञा की पूर्ति नहीं पाई। उन्होंने अल्लाह के साथ किए गए वचन को तोड़ दिया, और उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं किया। अल्लाह ने उनमें से अधिकतर को अवज्ञाकारी और सीमा का उल्लंघन करने वाला पाया, जो सत्य से भटक गए थे और अपनी इच्छाओं के पीछे चल रहे थे। यह उन लोगों की स्थिति का वर्णन है जिन्होंने अल्लाह के रसूलों को झुठलाया और उनके विरुद्ध विद्रोह किया। यहाँ "अधिकतर" का उल्लेख इसलिए किया गया है क्योंकि उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो ईमान लाए और वचन पर कायम रहे, परन्तु वे अल्पसंख्यक थे।
फ़ायदे (लाभ):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के साथ किए गए वचन और प्रतिज्ञा को पूरा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें अपने ईमान और इस्लाम के वचन पर सच्चे और स्थिर रहना चाहिए।
यह चेतावनी है कि अवज्ञा और विद्रोह का अंजाम बुरा होता है। जो लोग अल्लाह की आज्ञाओं से मुँह मोड़ते हैं, वे अपना नुक़सान करते हैं।
यह हमें प्रेरित करती है कि हम उन अल्पसंख्यकों में से बनें जो वचन पर कायम रहते हैं, न कि उन बहुसंख्यकों में से जो वचन तोड़ते हैं। सच्चाई और वफ़ादारी पर चलना ही सफलता का मार्ग है।
यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह हर चीज़ को जानता है और वह हमारे कर्मों और नीयतों से अवगत है। इसलिए हमें उसके सामने जवाबदेह होने का एहसास रखना चाहिए और अपने जीवन को उसकी रज़ा (प्रसन्नता) के अनुसार ढालना चाहिए।
क्या जो लोग अहले ज़मीन के बाद ज़मीन के वारिस (व मालिक) होते हैं उन्हें ये मालूम नहीं कि अगर हम चाहते तो उनके गुनाहों की बदौलत उनको मुसीबत में फँसा देते (मगर ये लोग ऐसे नासमझ हैं कि गोया) उनके दिलों पर हम ख़ुद (मोहर कर देते हैं कि ये लोग कुछ सुनते ही नहीं
(ऐ रसूल) ये चन्द बस्तियाँ हैं जिन के हालात हम तुमसे बयान करते हैं और इसमें तो शक़ ही नहीं कि उनके पैग़म्बर उनके पास वाजेए व रौशन मौजिज़े लेकर आए मगर ये लोग जिसके पहले झुठला चुके थे उस पर भला काहे को ईमान लाने वाले थे ख़ुदा यूं काफिरों के दिलों पर अलामत मुकर्रर कर देता है (कि ये ईमान न लाएँगें)
फिर हमने (उन पैग़म्बरान मज़कूरीन के बाद) मूसा को फिरऔन और उसके सरदारों के पास मौजिज़े अता करके (रसूल बनाकर) भेजा तो उन लोगों ने उन मौजिज़ात के साथ (बड़ी बड़ी) शरारतें की पस ज़रा ग़ौर तो करो कि आख़िर फसादियों का अन्जाम क्या हुआ
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