अल-आराफ · 128/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ اسْتَعِينُوا بِاللَّهِ وَاصْبِرُوا ۖ إِنَّ الْأَرْضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ ۝١٢٨
Qaala Moosaa liqawmihis ta`eenoo billaahi wasbiroo innal arda lillaahi yoorisuhaa mai yashaaa`u min `ibaadihee wal `aaqibatu lilmuttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
(ये सुनकर) मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि (भाइयों) ख़ुदा से मदद माँगों और सब्र करो सारी ज़मीन तो ख़ुदा ही की है वह अपने बन्दों में जिसकी चाहे उसका वारिस (व मालिक) बनाए और ख़ातमा बिल ख़ैर तो सब परहेज़गार ही का है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • اسْتَعِينُوا: मदद माँगो, सहायता चाहो।
  • وَاصْبِرُوا: धैर्य रखो, सब्र करो।
  • يُورِثُهَا: उसे (ज़मीन को) देता है, वारिस बनाता है।
  • الْعَاقِبَةُ: अंतिम परिणाम, अच्छा अंजाम।
  • الْمُتَّقِينَ: परहेज़गार, जो अल्लाह के आदेशों का पालन करें और उसकी मनाही से बचें।

तफ़सीर:

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम (बनी इसराइल) को नसीहत करते हुए कहा कि जब फ़िरऔन का ज़ुल्म और सितम तुम पर बढ़ गया है, और उसने तुम्हारे बेटों को क़त्ल करना और तुम्हारी बेटियों को ज़िंदा रखना शुरू कर दिया है, तो इस मुश्किल घड़ी में तुम्हें अल्लाह ही से मदद माँगनी चाहिए। उसी पर भरोसा रखो और उसी से सब्र की ताक़त माँगो। धैर्य और अल्लाह पर भरोसा ही वह ज़रिया है जिसके ज़रिए तुम इस आज़माइश पर क़ाबू पा सकते हो।

फिर हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें यक़ीन दिलाया कि यह ज़मीन (मिस्र की सरज़मीन) असल में अल्लाह की मिल्कियत है, न कि फ़िरऔन की। अल्लाह जिसे चाहता है, अपने बंदों में से इसका वारिस बनाता है। फ़िरऔन की सल्तनत और उसका ज़ुल्म कोई स्थायी चीज़ नहीं है, बल्कि यह बदलने वाली है। अल्लाह की मर्ज़ी के बग़ैर कोई भी हाकिम ज़मीन पर हुकूमत नहीं कर सकता। जब अल्लाह चाहेगा, वह इस ज़मीन को ज़ालिमों से छीनकर मज़लूमों और नेक लोगों को दे देगा।

और सबसे अहम बात यह है कि आख़िरी कामयाबी और अच्छा अंजाम (बेहतरीन नतीजा) उन्हीं लोगों के लिए है जो अल्लाह से डरते हैं, उसके आदेशों का पालन करते हैं और उसकी मनाही से बचते हैं। यह एक वादा है अल्लाह की तरफ़ से उन लोगों के लिए जो सब्र और तक़वा (परहेज़गारी) का रास्ता अपनाते हैं। चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, चाहे ज़ुल्म कितना भी बढ़ जाए, लेकिन अल्लाह का वादा सच्चा है कि आख़िरकार जीत उन्हीं की होगी जो अल्लाह के मुतक़ी (परहेज़गार) बंदे होंगे।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन में जब भी मुश्किलें आएँ, जब ज़ुल्म और सितम की अंधेरी रातें छाई हों, तो हमें अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए। सब्र और अल्लाह पर भरोसा ही वह चाबी है जो हर बंद दरवाज़े को खोल देती है। यह भी याद रखें कि यह ज़मीन अल्लाह की है, और वह जिसे चाहे उसे दे देता है। ज़ालिम चाहे कितना भी ताक़तवर क्यों न हो, उसकी हुकूमत हमेशा के लिए नहीं रहेगी। अल्लाह का वादा है कि अच्छा अंजाम उन्हीं का है जो उससे डरते हैं और नेक काम करते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में तक़वा (अल्लाह का ख़ौफ़) अपनाएँ, सब्र करें और अल्लाह से मदद माँगते रहें — यही कामयाबी का रास्ता है।



📜 आयत 126-130 — सूरा अल-आराफ

126وَمَا تَنقِمُ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِآيَاتِ رَبِّنَا لَمَّا جَاءَتْنَا ۚ رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ
तू हमसे उसके सिवा और काहे की अदावत रखता है कि जब हमारे पास ख़ुदा की निशानियाँ आयी तो हम उन पर ईमान लाए (और अब तो हमारी ये दुआ है कि) ऐ हमारे परवरदिगार हम पर सब्र (का मेंह बरसा)
127وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِ فِرْعَوْنَ أَتَذَرُ مُوسَىٰ وَقَوْمَهُ لِيُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ وَيَذَرَكَ وَآلِهَتَكَ ۚ قَالَ سَنُقَتِّلُ أَبْنَاءَهُمْ وَنَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ وَإِنَّا فَوْقَهُمْ قَاهِرُونَ
और हमने अपनी फरमाबरदारी की हालत में दुनिया से उठा ले और फिरऔन की क़ौम के चन्द सरदारों ने (फिरऔन) से कहा कि क्या आप मूसा और उसकी क़ौम को उनकी हालत पर छोड़ देंगे कि मुल्क में फ़साद करते फिरे और आपके और आपके ख़ुदाओं (की परसतिश) को छोड़ बैठें- फिरऔन कहने लगा (तुम घबराओ नहीं) हम अनक़रीब ही उनके बेटों की क़त्ल करते हैं और उनकी औरतों को (लौन्डियॉ बनाने के वास्ते) जिन्दा रखते हैं और हम तो उन पर हर तरह क़ाबू रखते हैं
128قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ اسْتَعِينُوا بِاللَّهِ وَاصْبِرُوا ۖ إِنَّ الْأَرْضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ
(ये सुनकर) मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि (भाइयों) ख़ुदा से मदद माँगों और सब्र करो सारी ज़मीन तो ख़ुदा ही की है वह अपने बन्दों में जिसकी चाहे उसका वारिस (व मालिक) बनाए और ख़ातमा बिल ख़ैर तो सब परहेज़गार ही का है
129قَالُوا أُوذِينَا مِن قَبْلِ أَن تَأْتِيَنَا وَمِن بَعْدِ مَا جِئْتَنَا ۚ قَالَ عَسَىٰ رَبُّكُمْ أَن يُهْلِكَ عَدُوَّكُمْ وَيَسْتَخْلِفَكُمْ فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ
वह लोग कहने लगे कि (ऐ मूसा) तुम्हारे आने के क़ब्ल (पहले) ही से और तुम्हारे आने के बाद भी हम को तो बराबर तकलीफ ही पहुँच रही है (आख़िर कहाँ तक सब्र करें) मूसा ने कहा अनकरीब ही तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे दुश्मन को हलाक़ करेगा और तुम्हें (उसका जानशीन) बनाएगा फिर देखेगा कि तुम कैसा काम करते हो
130وَلَقَدْ أَخَذْنَا آلَ فِرْعَوْنَ بِالسِّنِينَ وَنَقْصٍ مِّنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
और बेशक हमने फिरऔन के लोगों को बरसों से कहत और फलों की कम पैदावार (के अज़ाब) में गिरफ्तार किया ताकि वह इबरत हासिल करें
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
128आयत

अनुवाद — अल-आराफ 128

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Thursday, October 1, 2026

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