अल-आराफ · 78/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ ۝٧٨
Fa akhazat humur rajftu fa asbahoo fee daarihim jaasimmeen
📖 हिंदी अर्थ
तब उन्हें ज़लज़ले ने ले डाला और वह लोग ज़ानू पर सर किए (जिस तरह) बैठे थे बैठे के बैठे रह गए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الرَّجْفَةُ: अत्यंत भीषण भूकंप या ज़लज़ला, जिससे दिल उखड़ जाएं।
  • جَاثِمِينَ: मृत अवस्था में घुटनों और चेहरों के बल गिरे हुए, बेजान होकर ज़मीन से चिपके हुए।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम (समूद) ने हठ और सरकशी पर अड़े रहकर अल्लाह के नबी को झुठलाया और उस अज़ाब को मज़ाक़ समझकर जल्दी मांगा, तो अल्लाह का वादा पूरा हुआ। उन काफ़िरों को एक ऐसे भीषण भूकंप ने आ लिया जिसने उनके दिलों को चीर दिया और उनकी जानें निकाल दीं। सुबह होते-होते वे अपने ही घरों में इस हालत में पड़े हुए थे कि उनके चेहरे और घुटने ज़मीन से चिपके हुए थे, एक दूसरे के ऊपर गिरे हुए मुर्दा पड़े थे। उनमें से कोई भी इस अज़ाब से बचकर नहीं निकल सका। यह उनकी उस चुनौती का सीधा परिणाम था जो उन्होंने अल्लाह के अज़ाब के लिए जल्दी मांगी थी। यह मंज़र उनके लिए बेहद रुसवाई और ज़िल्लत का था, क्योंकि वे अपने घरों में ही मारे गए, बिना किसी को मौका दिए कि वे भाग सकें या कोई बचाव कर सके।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह का अज़ाब जब आता है तो किसी को मोहलत नहीं दी जाती; इसलिए इंसान को नबियों की दावत को गंभीरता से लेना चाहिए और उसे टालना या मज़ाक़ समझना नहीं चाहिए।
  2. अल्लाह की पकड़ इतनी सख्त होती है कि इंसान अपने ही घर में, अपनी ही जगह पर, बिना किसी पनाह के पकड़ा जाता है — यह दिखाता है कि अल्लाह से बचने की कोई जगह नहीं।
  3. जो लोग हक़ के मुक़ाबले में अकड़ते हैं और अज़ाब की जल्दी मांगते हैं, उन्हें अक्सर वही अज़ाब उस वक़्त आ पकड़ता है जब वे सबसे ज़्यादा ग़ाफ़िल होते हैं।
  4. यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि अल्लाह के नबियों की बात मानना और उनकी उम्मत में शामिल होना कितनी बड़ी नेमत है — जो लोग नबी की रहनुमाई में चले, वे अज़ाब से महफ़ूज़ रहे, और जिन्होंने झुठलाया वे तबाह हो गए।
  5. इस आयत से मुसलमान को यह सबक मिलता है कि वह अपनी ज़िंदगी में अल्लाह के हुक्मों की पैरवी करे और नबी की सुन्नत को थामे रहे, क्योंकि यही रास्ता दुनिया और आख़िरत की सलामती का ज़रिया है।


📜 आयत 76-80 — सूरा अल-आराफ

76قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا بِالَّذِي آمَنتُم بِهِ كَافِرُونَ
तब जिन लोगों को (अपनी दौलत दुनिया पर) घमन्ड था कहने लगे हम तो जिस पर तुम ईमान लाए हो उसे नहीं मानते
77فَعَقَرُوا النَّاقَةَ وَعَتَوْا عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ وَقَالُوا يَا صَالِحُ ائْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الْمُرْسَلِينَ
ग़रज़ उन लोगों ने ऊँटनी के कूचें और पैर काट डाले और अपने परवरदिगार के हुक्म से सरताबी की और (बेबाकी से) कहने लगे अगर तुम सच्चे रसूल हो तो जिस (अज़ाब) से हम लोगों को डराते थे अब लाओ
78فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ
तब उन्हें ज़लज़ले ने ले डाला और वह लोग ज़ानू पर सर किए (जिस तरह) बैठे थे बैठे के बैठे रह गए
79فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلَٰكِن لَّا تُحِبُّونَ النَّاصِحِينَ
उसके बाद सालेह उनसे टल गए और (उनसे मुख़ातिब होकर) कहा मेरी क़ौम (आह) मैनें तो अपने परवरदिगार के पैग़ाम तुम तक पहुचा दिए थे और तुम्हारे ख़ैरख्वाही की थी (और ऊँच नीच समझा दिया था) मगर अफसोस तुम (ख़ैरख्वाह) समझाने वालों को अपना दोस्त ही नहीं समझते
80وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ الْعَالَمِينَ
और (लूत को हमने रसूल बनाकर भेजा था) जब उन्होनें अपनी क़ौम से कहा कि (अफसोस) तुम ऐसी बदकारी (अग़लाम) करते हो कि तुमसे पहले सारी ख़ुदाई में किसी ने ऐसी बदकारी नहीं की थी
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
78आयत

अनुवाद — अल-आराफ 78

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Thursday, October 1, 2026

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