فَأَنجَيْنَاهُ: हमने उसे (लूत अलैहिस्सलाम को) बचा लिया।
أَهْلَهُ: उसके परिवार वालों को (जो ईमानवाले थे)।
إِلَّا امْرَأَتَهُ: उसकी पत्नी को छोड़कर।
الْغَابِرِينَ: पीछे रह जाने वाले, यानी हलाक होने वालों में शामिल, या उस समूह में बाकी रहने वाले जो अज़ाब में रह गए।
तफसीर:
जब अल्लाह तआला ने क़ौमे-लूत पर अज़ाब नाज़िल करने का फ़ैसला किया, तो उसने अपने नबी लूत अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया कि वे रात के समय अपने ईमानवाले परिवार के साथ उस बस्ती से निकल जाएँ। अल्लाह ने उन्हें और उनके परिवार के उन लोगों को सुरक्षित निकाल लिया जो उन पर ईमान लाए थे। लेकिन उनकी पत्नी उनके साथ नहीं गई, क्योंकि वह ईमान नहीं लाई थी और क़ौम के बुरे कामों की साथी थी। वह उन्हीं लोगों में रह गई जो अज़ाब में हलाक हुए। इस तरह वह पीछे रह जाने वालों और तबाह होने वालों में शामिल हो गई। यह अल्लाह की सुन्नत है कि वह अपने नबियों और उनके सच्चे साथियों को बचा लेता है, लेकिन जो लोग कुफ्र और नाफ़रमानी पर डटे रहते हैं, उन्हें अज़ाब से कोई नहीं बचा सकता, चाहे वह नबी की पत्नी ही क्यों न हो।
फ़ायदे:
अल्लाह की रहमत अपने नेक बंदों के लिए ख़ास होती है, और वह उन्हें मुसीबतों से निकाल लेता है, बशर्ते वे ईमान और अच्छे कामों पर क़ायम रहें।
नस्ल या रिश्ते किसी को अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकते; हर इंसान अपने ईमान और अमल के हिसाब से जवाबदेह है। नबी की पत्नी होना भी उसके कुफ्र की वजह से काम न आया।
इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि हम अपने घरों और परिवारों को ईमान और नेकी पर क़ायम रखने की कोशिश करें, क्योंकि अगर घर वाले ईमान से महरूम रहे तो दुनिया और आख़िरत दोनों में नुक़सान उठाना पड़ता है।
अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, और उसका अज़ाब आने पर कोई उसे टाल नहीं सकता; इसलिए हमें हमेशा उसकी इताअत और रसूल की पैरवी में रहना चाहिए।
सिर्फ करनें वालों (को नुत्फे को ज़ाए करते हो उस पर उसकी क़ौम का उसके सिवा और कुछ जवाब नहीं था कि वह आपस में कहने लगे कि उन लोगों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो क्योंकि ये तो वह लोग हैं जो पाक साफ बनना चाहते हैं)
और (हमने) मदयन (वालों के) पास उनके भाई शुएब को (रसूल बनाकर भेजा) तो उन्होंने (उन लोगों से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो उसके सिवा कोई दूसरा माबूद नहीं (और) तुम्हारे पास तो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक वाजेए व रौशन मौजिज़ा (भी) आ चुका तो नाप और तौल पूरी किया करो और लोगों को उनकी (ख़रीदी हुई) चीज़ में कम न दिया करो और ज़मीन में उसकी असलाह व दुरूस्ती के बाद फसाद न करते फिरो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
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