अल-मआरिज · 36/44
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मआरिज
فَمَالِ الَّذِينَ كَفَرُوا قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ ۝٣٦
Famaa lil lazeena kafaroo qibalaka muhti`een
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) काफिरों को क्या हो गया है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • قِبَلَكَ – तुम्हारी ओर, तुम्हारे सामने
  • مُهْطِعِينَ – तेज़ी से दौड़ते हुए, गर्दनें उठाए हुए, निगाहें गड़ाए हुए

तफ़सीर:

ऐ नबी! इन काफ़िरों को क्या हो गया है जो तुम्हारी ओर तेज़ी से दौड़ते चले आ रहे हैं, अपनी गर्दनें उठाए हुए और अपनी निगाहें तुम पर जमाए हुए? वे तुम्हारे दाएँ-बाएं गिरोहों में बँटकर इकट्ठा होते हैं, आपस में कानाफूसी करते हैं और अचरज में पड़कर तुम्हें देखते हैं। यह कैसी अजीब हालत है कि जो लोग सत्य को झुठला रहे हैं, वे खुद तुम्हारे पास इस तरह दौड़े-दौड़े आते हैं, मानो किसी चीज़ की तलाश में हों!

क्या इनमें से हर एक यह तमन्ना रखता है कि उसे आराम और सुख की जन्नत में दाखिल कर दिया जाए? हरगिज़ नहीं! यह उनकी खोखली आशा है। वे जन्नत में कभी दाखिल नहीं होंगे, क्योंकि हमने उन्हें उसी चीज़ से पैदा किया है जिससे बाकी इंसान पैदा होते हैं — एक कमज़ोर और हक़ीर पानी (नुत्फ़ा) से। उनके पास कोई ऐसी विशेषता नहीं जो उन्हें जन्नत का हक़दार बनाती। उन्होंने अपने रब की नेमतों को झुठलाया, अपने नबी की दावत को ठुकराया, और फिर भी वे जन्नत की उम्मीद रखते हैं? यह कैसी बेवजह की उम्मीद है!

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि इंसान कितना अजीब है — वह हक़ से मुँह मोड़ता है, लेकिन अल्लाह की रहमत की उम्मीद भी रखता है। अल्लाह तआला बड़ा दयालु और क्षमाशील है, लेकिन उसकी रहमत उन्हीं को मिलती है जो उसकी ओर रुजू करें, उसके हुक्मों को मानें और उसके रसूल की पैरवी करें। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह की ओर लौट आएं, उनके लिए जन्नत के दरवाज़े खुले हैं, और जो अहंकार में सत्य को ठुकराते रहें, उनका अंजाम अफ़सोसनाक होगा। आओ, हम अपनी ज़िंदगी को देखें — क्या हम उन लोगों में से हैं जो हक़ की तरफ दौड़ते हैं, या उनमें से हैं जो हक़ से भागते हैं? अल्लाह हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे।



📜 आयत 34-38 — सूरा अल-मआरिज

34وَالَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
और जो लोग अपनी नमाज़ो का ख्याल रखते हैं
35أُولَٰئِكَ فِي جَنَّاتٍ مُّكْرَمُونَ
यही लोग बेहिश्त के बाग़ों में इज्ज़त से रहेंगे
36فَمَالِ الَّذِينَ كَفَرُوا قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ
तो (ऐ रसूल) काफिरों को क्या हो गया है
37عَنِ الْيَمِينِ وَعَنِ الشِّمَالِ عِزِينَ
कि तुम्हारे पास गिरोह गिरोह दाहिने से बाएँ से दौड़े चले आ रहे हैं
38أَيَطْمَعُ كُلُّ امْرِئٍ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍ
क्या इनमें से हर शख़्श इस का मुतमइनी है कि चैन के बाग़ (बेहिश्त) में दाख़िल होगा
अल-मआरिजकुरान सूची
44आयत
मक्कीअवतरण स्थान
36आयत

अनुवाद — अल-मआरिज 36

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Thursday, October 1, 2026

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