अल-अनफाल · 20/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَأَنتُمْ تَسْمَعُونَ ۝٢٠
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo atee`ul laaha wa Rasoolahoo wa laa tawallaw `anhu wa antum tasm`oon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ ईमानदारों खुदा और उसके रसूल की इताअत करो और उससे मुँह न मोड़ो जब तुम समझ रहे हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا تَوَلَّوْا – मुँह मत मोड़ो, अर्थात आज्ञा का उल्लंघन करके विमुख मत हो जाओ।
  • تَسْمَعُونَ – तुम सुन रहे हो, अर्थात तुम्हारे सामने कुरआन की आयतें पढ़ी जा रही हैं और तुम उन्हें सुन रहे हो।

व्याख्या:

हे ईमानवालो! तुम अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की आज्ञा का पालन करो, जो कुछ वे आदेश दें उसे अपनाओ और जिससे रोकें उससे बचो। अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा से मुँह मत मोड़ो, और न ही उनके आदेशों की अवहेलना करो, जबकि तुम कुरआन की आयतें सुन रहे हो जो तुम्हारे सामने पढ़ी जा रही हैं। ये आयतें स्पष्ट प्रमाण और तर्क प्रस्तुत करती हैं, जो सत्य को स्पष्ट कर देती हैं। इसके बावजूद यदि तुम विमुख हो जाओगे, तो यह जानबूझकर सत्य को अस्वीकार करने के समान होगा। यहाँ "सुनते हुए" का उल्लेख इसलिए किया गया है कि जिस व्यक्ति के पास साक्ष्य पहुँच चुके हों, उसके लिए बहाना बनाना उचित नहीं है। यह आयत उन लोगों की ओर संकेत करती है जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की मजलिस में बैठते थे, कुरआन सुनते थे, लेकिन जब उठते थे तो उसके विपरीत कार्य करते थे।

लाभ एवं शिक्षाएँ:

  1. अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन ईमान का मूल आधार है, और इसे ही सच्चा ईमान माना जाता है।
  2. ज्ञान और साक्ष्य प्राप्त होने के बाद उसके विपरीत कार्य करना अत्यंत गंभीर अपराध है, क्योंकि तब बहाना स्वीकार नहीं किया जाता।
  3. कुरआन की आयतों को सुनना एक जिम्मेदारी पैदा करता है; सुनने के बाद उस पर अमल करना अनिवार्य हो जाता है।
  4. यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि वे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेशों को सुनते ही उनका पालन करें, न कि उनसे मुँह मोड़ें। यही उनकी सफलता और भलाई का मार्ग है।
  5. अल्लाह का आदेश सुनने के बाद उसकी अवहेलना करना व्यक्ति को अल्लाह की नाराज़गी और पकड़ का पात्र बनाता है, इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह कुरआन और सुन्नत को अपना मार्गदर्शक बनाए।


📜 आयत 18-22 — अल-अनफाल

18ذَٰلِكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ مُوهِنُ كَيْدِ الْكَافِرِينَ
ये तो ये ख़ुदा तो काफिरों की मक्कारी का कमज़ोर कर देने वाला है
19إِن تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَاءَكُمُ الْفَتْحُ ۖ وَإِن تَنتَهُوا فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَإِن تَعُودُوا نَعُدْ وَلَن تُغْنِيَ عَنكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْئًا وَلَوْ كَثُرَتْ وَأَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُؤْمِنِينَ
(काफ़िर) अगर तुम ये चाहते हो (कि जो हक़ पर हो उसकी) फ़तेह हो (मुसलमानों की) फ़तेह भी तुम्हारे सामने आ मौजूद हुई अब क्या गुरूर बाक़ी है और अगर तुम (अब भी मुख़तलिफ़ इस्लाम) से बाज़ रहो तो तुम्हारे वास्ते बेहतर है और अगर कहीं तुम पलट पड़े तो (याद रहे) हम भी पलट पड़ेगें (और तुम्हें तबाह कर छोड़ देगें) और तुम्हारी जमाअत अगरचे बहुत ज्यादा भी हो हरगिज़ कुछ काम न आएगी और ख़ुदा तो यक़ीनी मामिनीन के साथ है
20يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَأَنتُمْ تَسْمَعُونَ
(ऐ ईमानदारों खुदा और उसके रसूल की इताअत करो और उससे मुँह न मोड़ो जब तुम समझ रहे हो
21وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
और उन लोगों के ऐसे न हो जाओं जो (मुँह से तो) कहते थे कि हम सुन रहे हैं हालाकि वह सुनते (सुनाते ख़ाक) न थे
22۞ إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِندَ اللَّهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ
इसमें शक़ नहीं कि ज़मीन पर चलने वाले तमाम हैवानात से बदतर ख़ुदा के नज़दीक वह बहरे गूँगे (कुफ्फार) हैं जो कुछ नहीं समझते
अल-अनफालकुरान सूची
75आयत
मदनीRevelation
20आयत

अनुवाद — अल-अनफाल 20

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Tuesday, August 18, 2026

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