अल-अनफाल · 21/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ ۝٢١
Wa laa takoonoo kallazeena qaaloo sami`naa wa hum laa yasma`oon
📖 हिंदी अर्थ
और उन लोगों के ऐसे न हो जाओं जो (मुँह से तो) कहते थे कि हम सुन रहे हैं हालाकि वह सुनते (सुनाते ख़ाक) न थे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • قَالُوا سَمِعْنَا: उन्होंने कहा कि हमने सुन लिया।
  • وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ: जबकि वे वास्तव में सुनते नहीं हैं (अर्थात् उनका सुनना दिल से नहीं, बल्कि सिर्फ़ ज़ुबान से है)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में ईमानवालों को नसीहत करते हुए कहते हैं कि ऐ ईमानवालों! तुम उन लोगों की तरह मत बनो, जिन्होंने (मुनाफ़िक़ीन और मुशरिकीन) जब अल्लाह की आयतें पढ़ी जातीं थीं, तो मुँह से कहते थे कि "हमने सुन लिया", लेकिन उनके दिल उस पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र नहीं करते थे, न ही वे उससे सबक़ हासिल करते थे। उनका सुनना सिर्फ़ कानों तक सीमित था, दिल तक नहीं पहुँचता था। वे न तो उस पर अमल करते थे और न ही उसे सच मानते थे। उनकी यह हालत इस बात की दलील है कि वे सुनने के बावजूद अंधे और बहरे थे, क्योंकि उन्होंने सुनकर भी उससे फ़ायदा नहीं उठाया। यह आयत मुनाफ़िक़ों के बारे में नाज़िल हुई, जो ज़ुबान से कहते थे कि हमने सुन लिया, लेकिन दिल से उसे झुठलाते थे।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. सुनना सिर्फ़ कानों का काम नहीं है, बल्कि असली सुनना वह है जो दिल की गहराई तक पहुँचे और इंसान को अल्लाह की इताअत पर उभारे।
  2. मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि वे ज़ुबान से ईमान का दावा करते हैं, लेकिन उनके दिलों में उसकी कोई हक़ीक़त नहीं होती।
  3. ईमानवाले को चाहिए कि जब वह अल्लाह की आयतें सुने, तो उन पर ग़ौर करे, उन्हें समझे और उन पर अमल करे, ताकि उसका सुनना उसके लिए नेकी का ज़रिया बने।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का कलाम सुनने का मक़सद सिर्फ़ सुनना नहीं, बल्कि उससे हिदायत हासिल करना और उसके मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी बनाना है।
🎧 सुनें

📜 आयत 19-23 — अल-अनफाल

19إِن تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَاءَكُمُ الْفَتْحُ ۖ وَإِن تَنتَهُوا فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَإِن تَعُودُوا نَعُدْ وَلَن تُغْنِيَ عَنكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْئًا وَلَوْ كَثُرَتْ وَأَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُؤْمِنِينَ
(काफ़िर) अगर तुम ये चाहते हो (कि जो हक़ पर हो उसकी) फ़तेह हो (मुसलमानों की) फ़तेह भी तुम्हारे सामने आ मौजूद हुई अब क्या गुरूर बाक़ी है और अगर तुम (अब भी मुख़तलिफ़ इस्लाम) से बाज़ रहो तो तुम्हारे वास्ते बेहतर है और अगर कहीं तुम पलट पड़े तो (याद रहे) हम भी पलट पड़ेगें (और तुम्हें तबाह कर छोड़ देगें) और तुम्हारी जमाअत अगरचे बहुत ज्यादा भी हो हरगिज़ कुछ काम न आएगी और ख़ुदा तो यक़ीनी मामिनीन के साथ है
20يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَأَنتُمْ تَسْمَعُونَ
(ऐ ईमानदारों खुदा और उसके रसूल की इताअत करो और उससे मुँह न मोड़ो जब तुम समझ रहे हो
21وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
और उन लोगों के ऐसे न हो जाओं जो (मुँह से तो) कहते थे कि हम सुन रहे हैं हालाकि वह सुनते (सुनाते ख़ाक) न थे
22۞ إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِندَ اللَّهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ
इसमें शक़ नहीं कि ज़मीन पर चलने वाले तमाम हैवानात से बदतर ख़ुदा के नज़दीक वह बहरे गूँगे (कुफ्फार) हैं जो कुछ नहीं समझते
23وَلَوْ عَلِمَ اللَّهُ فِيهِمْ خَيْرًا لَّأَسْمَعَهُمْ ۖ وَلَوْ أَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوا وَّهُم مُّعْرِضُونَ
और अगर ख़ुदा उनमें नेकी (की बू भी) देखता तो ज़रूर उनमें सुनने की क़ाबलियत अता करता मगर ये ऐसे हैं कि अगर उनमें सुनने की क़ाबिलयत भी देता तो मुँह फेर कर भागते।
अल-अनफालकुरान सूची
75आयत
मदनीRevelation
21आयत

अनुवाद — अल-अनफाल 21

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Tuesday, August 18, 2026

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