और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
يَسْتَمِعُونَ – सुनते हैं (कानों से)
الصُّمّ – बहरे (जिनके कान सुनने की शक्ति नहीं रखते)
يَعْقِلُونَ – समझते-बूझते हैं, अक्ल से काम लेते हैं
व्याख्या:
हे नबी! इन काफिरों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आपकी बातें और कुरान की तिलावत सुनते हैं, लेकिन उनके दिल इसे स्वीकार नहीं करते। वे सुनते तो हैं, परंतु उनका सुनना कोई फल नहीं देता, क्योंकि उनके दिल बंद हैं और वे सत्य को समझना ही नहीं चाहते।
क्या आप उन बहरों को सुना सकते हैं जिनके कानों ने सुनने की शक्ति खो दी है? बिल्कुल नहीं। इसी प्रकार, जिन लोगों ने अपने दिलों को अंधा कर लिया है और सत्य को समझने की क्षमता को खत्म कर दिया है, उन्हें आप हिदायत नहीं दे सकते। हिदायत तो केवल अल्लाह के हाथ में है। ये लोग सुनते तो हैं, लेकिन उनकी समझ और अक्ल उन्हें सत्य की ओर नहीं ले जाती, क्योंकि उन्होंने अपनी अक्ल को भी सत्य से दूर कर दिया है।
फ़ायदे:
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि हिदायत देना केवल अल्लाह के अधिकार में है। हमारा काम केवल सत्य को पहुँचाना है, परिणाम अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए।
सुनना और समझना दो अलग चीज़ें हैं। कई लोग कानों से सुनते हैं, लेकिन दिल से सच्चाई को स्वीकार नहीं करते। हमें चाहिए कि हम दिल से सुनें और समझें।
यह आयत हमें धैर्य और सब्र सिखाती है। जब हम लोगों को अच्छी बात समझाएँ और वे न मानें, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपना कर्तव्य निभाते रहना चाहिए।
अल्लाह की रहमत से हमें यह अहसास कराया गया है कि हमें अपने कान, आँख और दिल का सही उपयोग करना चाहिए, ताकि हम सत्य को पहचान सकें और उस पर अमल कर सकें। यह अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है।
और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम ज़िम्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ
तुम कही बहरों को कुछ सुना सकते हो और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो तुम्हारी तरफ (टकटकी बाँधे) देखते हैं तो (क्या वह ईमान लाएँगें हरगिज़ नहीं) अगरचे उन्हें कुछ न सूझता हो तो तुम अन्धे को राहे रास्त दिखा दोगे
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