यूनुस · 42/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا لَا يَعْقِلُونَ ۝٤٢
Wa minhum mai yastami`oona iliak; afa anta tusmi`us summa wa law kaanoo la ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَسْتَمِعُونَ – सुनते हैं (कानों से)
  • الصُّمّ – बहरे (जिनके कान सुनने की शक्ति नहीं रखते)
  • يَعْقِلُونَ – समझते-बूझते हैं, अक्ल से काम लेते हैं

व्याख्या:

हे नबी! इन काफिरों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आपकी बातें और कुरान की तिलावत सुनते हैं, लेकिन उनके दिल इसे स्वीकार नहीं करते। वे सुनते तो हैं, परंतु उनका सुनना कोई फल नहीं देता, क्योंकि उनके दिल बंद हैं और वे सत्य को समझना ही नहीं चाहते।

क्या आप उन बहरों को सुना सकते हैं जिनके कानों ने सुनने की शक्ति खो दी है? बिल्कुल नहीं। इसी प्रकार, जिन लोगों ने अपने दिलों को अंधा कर लिया है और सत्य को समझने की क्षमता को खत्म कर दिया है, उन्हें आप हिदायत नहीं दे सकते। हिदायत तो केवल अल्लाह के हाथ में है। ये लोग सुनते तो हैं, लेकिन उनकी समझ और अक्ल उन्हें सत्य की ओर नहीं ले जाती, क्योंकि उन्होंने अपनी अक्ल को भी सत्य से दूर कर दिया है।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि हिदायत देना केवल अल्लाह के अधिकार में है। हमारा काम केवल सत्य को पहुँचाना है, परिणाम अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए।
  2. सुनना और समझना दो अलग चीज़ें हैं। कई लोग कानों से सुनते हैं, लेकिन दिल से सच्चाई को स्वीकार नहीं करते। हमें चाहिए कि हम दिल से सुनें और समझें।
  3. यह आयत हमें धैर्य और सब्र सिखाती है। जब हम लोगों को अच्छी बात समझाएँ और वे न मानें, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपना कर्तव्य निभाते रहना चाहिए।
  4. अल्लाह की रहमत से हमें यह अहसास कराया गया है कि हमें अपने कान, आँख और दिल का सही उपयोग करना चाहिए, ताकि हम सत्य को पहचान सकें और उस पर अमल कर सकें। यह अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है।
🎧 सुनें

📜 आयत 40-44 — यूनुस

40وَمِنْهُم مَّن يُؤْمِنُ بِهِ وَمِنْهُم مَّن لَّا يُؤْمِنُ بِهِ ۚ وَرَبُّكَ أَعْلَمُ بِالْمُفْسِدِينَ
और उनमें से बाज़ तो ऐसे है कि इस कुरान पर आइन्दा ईमान लाएगें और बाज़ ऐसे हैं जो ईमान लाएगें ही नहीं
41وَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل لِّي عَمَلِي وَلَكُمْ عَمَلُكُمْ ۖ أَنتُم بَرِيئُونَ مِمَّا أَعْمَلُ وَأَنَا بَرِيءٌ مِّمَّا تَعْمَلُونَ
और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम ज़िम्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ
42وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا لَا يَعْقِلُونَ
और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो
43وَمِنْهُم مَّن يَنظُرُ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تَهْدِي الْعُمْيَ وَلَوْ كَانُوا لَا يُبْصِرُونَ
तुम कही बहरों को कुछ सुना सकते हो और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो तुम्हारी तरफ (टकटकी बाँधे) देखते हैं तो (क्या वह ईमान लाएँगें हरगिज़ नहीं) अगरचे उन्हें कुछ न सूझता हो तो तुम अन्धे को राहे रास्त दिखा दोगे
44إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا وَلَٰكِنَّ النَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
ख़ुदा तो हरगिज़ लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता मगर लोग खुद अपने ऊपर (अपनी करतूत से) जुल्म किया करते है
यूनुसकुरान सूची
109आयत
मक्कीRevelation
42आयत

अनुवाद — यूनुस 42

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Tuesday, August 18, 2026

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