हूद · 70/123
अनुवाद उच्चारण — सूरा हूद
فَلَمَّا رَأَىٰ أَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ إِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۚ قَالُوا لَا تَخَفْ إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَىٰ قَوْمِ لُوطٍ ۝٧٠
Falammaa ra aaa aidiyahum laa tasilu ilaihi nakirahum wa awjasa minhum kheefah; qaaloo la takhaf innaaa ursilnaaa ilaa qawmi Loot
📖 हिंदी अर्थ
(और साथ खाने बैठें) फिर जब देखा कि उनके हाथ उसकी तरफ नहीं बढ़ते तो उनकी तरफ से बदगुमान हुए और जी ही जी में डर गए (उसको वह फरिश्ते समझे) और कहने लगे आप डरे नहीं हम तो क़ौम लूत की तरफ (उनकी सज़ा के लिए) भेजे गए हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नकिरहुम (نَكِرَهُمْ): उन्हें अनजान समझा, उनके बारे में बुरा गुमान किया।
  • औजसा (أَوْجَسَ): अपने दिल में छिपाया, महसूस किया।
  • ख़ीफ़ा (خِيفَةً): डर, भय।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने देखा कि मेहमानों के हाथ उस भुने हुए बछड़े की तरफ़ नहीं बढ़ रहे हैं और वे उसे नहीं खा रहे हैं, तो वे उनसे अनजान हुए और उन्होंने अपने दिल में उनसे डर महसूस किया। यह डर इसलिए था क्योंकि उस समय के रिवाज के मुताबिक़, अगर कोई मेहमान खाना न खाए तो समझा जाता था कि उसका इरादा बुरा है। जब फ़रिश्तों ने हज़रत इब्राहीम का यह डर देखा, तो उन्होंने तसल्ली देते हुए कहा: "डरो मत, हम अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्ते हैं, हम आपके दुश्मन नहीं हैं। हमें हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम की तरफ़ भेजा गया है ताकि उन्हें उनके गुनाहों की सज़ा दी जाए।"

यहाँ अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम की मेहमाननवाज़ी का ज़िक्र किया है कि उन्होंने फ़रिश्तों को मेहमान समझकर उनके लिए खाना तैयार किया, लेकिन जब उन्होंने खाना नहीं खाया तो वे घबरा गए। फ़रिश्तों ने उन्हें सुकून दिया और अपना परिचय दिया।

फ़ायदे (सबक):

  1. मेहमाननवाज़ी इस्लाम की पहचान है: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मेहमानों के लिए भुना हुआ बछड़ा पेश किया, यह हमें सिखाता है कि मेहमान का सम्मान करना और उसकी ख़ातिरदारी करना इस्लामी अख़्लाक़ का हिस्सा है।
  2. डर और घबराहट में अल्लाह पर भरोसा: जब इंसान किसी मुश्किल या डर की स्थिति में हो, तो उसे अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। फ़रिश्तों ने हज़रत इब्राहीम को तसल्ली दी, यह दिखाता है कि अल्लाह अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त करता है।
  3. अल्लाह के फ़ैसले पर यक़ीन: फ़रिश्तों का हज़रत लूत की क़ौम की तरफ़ भेजा जाना यह बताता है कि अल्लाह की सज़ा उसकी मोहलत के बाद आती है, और अल्लाह का इंसाफ़ कभी ग़लत नहीं होता।
  4. नेक लोगों की हिफ़ाज़त: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह अपने नेक बंदों को मुसीबतों से बचाता है और उन्हें सुकून देता है, चाहे हालात कितने भी भयानक क्यों न हों।


📜 आयत 68-72 — सूरा हूद

68كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا فِيهَا ۗ أَلَا إِنَّ ثَمُودَ كَفَرُوا رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًا لِّثَمُودَ
और ऐसे मर मिटे कि गोया उनमें कभी बसे ही न थे तो देखो क़ौमे समूद ने अपने परवरदिगार की नाफरमानी की और (सज़ा दी गई) सुन रखो कि क़ौमे समूद (उसकी बारगाह से) धुत्कारी हुईहै
69وَلَقَدْ جَاءَتْ رُسُلُنَا إِبْرَاهِيمَ بِالْبُشْرَىٰ قَالُوا سَلَامًا ۖ قَالَ سَلَامٌ ۖ فَمَا لَبِثَ أَن جَاءَ بِعِجْلٍ حَنِيذٍ
और हमारे भेजे हुए (फरिश्ते) इबराहीम के पास खुशख़बरी लेकर आए और उन्होंने (इबराहीम को) सलाम किया (इबराहीम ने) सलाम का जवाब दिया फिर इबराहीम एक बछड़े का भुना हुआ (गोश्त) ले आए
70فَلَمَّا رَأَىٰ أَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ إِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۚ قَالُوا لَا تَخَفْ إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَىٰ قَوْمِ لُوطٍ
(और साथ खाने बैठें) फिर जब देखा कि उनके हाथ उसकी तरफ नहीं बढ़ते तो उनकी तरफ से बदगुमान हुए और जी ही जी में डर गए (उसको वह फरिश्ते समझे) और कहने लगे आप डरे नहीं हम तो क़ौम लूत की तरफ (उनकी सज़ा के लिए) भेजे गए हैं
71وَامْرَأَتُهُ قَائِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَاهَا بِإِسْحَاقَ وَمِن وَرَاءِ إِسْحَاقَ يَعْقُوبَ
और इबराहीम की बीबी (सायरा) खड़ी हुई थी वह (ये ख़बर सुनकर) हॅस पड़ी तो हमने (उन्हेंफ़रिश्तों के ज़रिए से) इसहाक़ के पैदा होने की खुशख़बरी दी और इसहाक़ के बाद याक़ूब की
72قَالَتْ يَا وَيْلَتَىٰ أَأَلِدُ وَأَنَا عَجُوزٌ وَهَٰذَا بَعْلِي شَيْخًا ۖ إِنَّ هَٰذَا لَشَيْءٌ عَجِيبٌ
वह कहने लगी ऐ है क्या अब मै बच्चा जनने बैठॅूगी मैं तो बुढ़िया हूँ और ये मेरे मियॉ भी बूढे है ये तो एक बड़ी ताज्जुब खेज़ बात है
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अनुवाद — हूद 70

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Friday, October 2, 2026

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