अन-नहल · 20/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ ۝٢٠
Wallazeena yad`oona min doonil laahi laa yakhluqoona shai`anw wa hum yukhlaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो और जो कुछ ज़ाहिर करते हो (ग़रज़) ख़ुदा (सब कुछ) जानता है और (ये कुफ्फार) ख़ुदा को छोड़कर जिन लोगों को (हाजत के वक्त) पुकारते हैं वह कुछ भी पैदा नहीं कर सकते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَدْعُونَ: पुकारते हैं, उपासना करते हैं।
  • مِن دُونِ اللَّهِ: अल्लाह को छोड़कर।
  • لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا: वे किसी चीज़ को पैदा नहीं करते।
  • وَهُمْ يُخْلَقُونَ: जबकि वे स्वयं पैदा किए जाते हैं।

तफ़सीर:

यह आयत उन मूर्तियों और झूठे देवताओं की स्थिति स्पष्ट करती है जिन्हें मुशरिकीन (बहुदेववादी) अल्लाह के सिवा पुकारते हैं और उनकी पूजा करते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये मूर्तियाँ जिन्हें तुम अपना माबूद बनाते हो, वे किसी भी चीज़ को पैदा करने की शक्ति नहीं रखतीं, चाहे वह चीज़ कितनी ही छोटी और तुच्छ क्यों न हो। वे न तो किसी को जीवन दे सकती हैं, न मौत, न रिज़्क़, और न ही किसी भलाई या बुराई को पैदा कर सकती हैं।

इसके विपरीत, ये मूर्तियाँ स्वयं मख़लूक़ हैं — इंसानों द्वारा बनाई गई हैं। लोग अपने हाथों से पत्थर, लकड़ी या धातु को काटकर उन्हें आकार देते हैं, फिर उन्हें पूजने लगते हैं। यानी जो चीज़ खुद पैदा की गई हो, जो खुद किसी कारीगर की बनाई हुई हो, वह दूसरों को कैसे पैदा कर सकती है? क्या कोई समझदार इंसान उस चीज़ की पूजा कर सकता है जो उसके अपने हाथों की बनाई हो? यह बड़ी बेवकूफी और अज्ञानता की बात है कि इंसान खुद जिसे बनाता है, उसके आगे सिर झुकाए।

यह आयत मुशरिकीन की उस मानसिकता पर करारी चोट करती है जो पत्थर की मूर्तियों को खुदा का दर्जा देते थे। अल्लाह तआला उन्हें बताता है कि जो चीज़ खुद मख़लूक़ हो, वह ख़ालिक़ (पैदा करने वाला) कैसे हो सकती है? सृष्टि का काम केवल उसी का है जो स्वयं अज़ली (अनादि) हो, जो किसी से पैदा न हुआ हो और जिसने सब कुछ पैदा किया हो — वही अल्लाह है।

फ़ायदे और सबक़:

  1. तौहीद की पुख़्ता दलील: यह आयत हमें सिखाती है कि इबादत के लायक़ वही है जो पैदा करने की शक्ति रखता हो। जो खुद पैदा किया गया हो, वह इबादत का हक़दार नहीं हो सकता। यह एक सरल और तर्कसंगत दलील है जो हर समझदार इंसान के दिल में उतरती है।
  2. अक़्ल का इस्तेमाल: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इंसान को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना चाहिए। जब कोई चीज़ खुद बनाई हुई हो, तो उसकी पूजा करना अक़्ल के खिलाफ़ है। इस्लाम हमें अंधी पैरवी के बजाय सोच-समझकर सच्चाई को क़बूल करने की तरग़ीब देता है।
  3. अल्लाह की क़ुदरत का अहसास: जब हम देखते हैं कि यह विशाल ब्रह्मांड, आसमान, ज़मीन, पहाड़, समुद्र, पेड़-पौधे, जानवर और इंसान — सब कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, तो हमारा दिल उसकी अज़मत के आगे झुक जाता है। यह अहसास हमें अल्लाह का शुक्रगुज़ार बनाता है और उसकी इबादत की तरफ़ राग़िब करता है।
  4. शिर्क से बचाव: यह आयत हमें शिर्क के ख़तरे से आगाह करती है। जो इंसान अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारता है या उससे मदद माँगता है, वह उस चीज़ से उम्मीद लगाता है जो खुद बेबस और मजबूर है। यह सबक़ हमें सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा करने की तालीम देता है।
  5. इस्लाम की आसानी: इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम का अक़ीदा कितना साफ़ और आसान है — बस एक अल्लाह की इबादत करो जो सब कुछ पैदा करने वाला है। यही फ़ितरत का दीन है, और यही इंसान को सुकून और कामयाबी की राह दिखाता है।


📜 आयत 18-22 — अन-नहल

18وَإِن تَعُدُّوا نِعْمَةَ اللَّهِ لَا تُحْصُوهَا ۗ إِنَّ اللَّهَ لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ
तो क्या जो (ख़ुदा इतने मख़लूकात को) पैदा करता है वह उन (बुतों के बराबर हो सकता है जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते तो क्या तुम (इतनी बात भी) नहीं समझते और अगर तुम ख़ुदा की नेअमतों को गिनना चाहो तो (इस कसरत से हैं कि) तुम नहीं गिन सकते हो
19وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُسِرُّونَ وَمَا تُعْلِنُونَ
बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है कि (तुम्हारी नाफरमानी पर भी नेअमत देता है)
20وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ
और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो और जो कुछ ज़ाहिर करते हो (ग़रज़) ख़ुदा (सब कुछ) जानता है और (ये कुफ्फार) ख़ुदा को छोड़कर जिन लोगों को (हाजत के वक्त) पुकारते हैं वह कुछ भी पैदा नहीं कर सकते
21أَمْوَاتٌ غَيْرُ أَحْيَاءٍ ۖ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ
(बल्कि) वह ख़ुद दूसरों के बनाए हुए मुर्दे बेजान हैं और इतनी भी ख़बर नहीं कि कब (क़यामत) होगी और कब मुर्दे उठाए जाएगें
22إِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۚ فَالَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ قُلُوبُهُم مُّنكِرَةٌ وَهُم مُّسْتَكْبِرُونَ
(फिर क्या काम आएंगीं)तुम्हारा परवरदिगार यकता खुदा है तो जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते उनके दिल ही (इस वजह के हैं कि हर बात का) इन्कार करते हैं और वह बड़े मग़रुर हैं
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अनुवाद — अन-नहल 20

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Tuesday, August 18, 2026

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