अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- يَدْعُونَ: पुकारते हैं, उपासना करते हैं।
- مِن دُونِ اللَّهِ: अल्लाह को छोड़कर।
- لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا: वे किसी चीज़ को पैदा नहीं करते।
- وَهُمْ يُخْلَقُونَ: जबकि वे स्वयं पैदा किए जाते हैं।
तफ़सीर:
यह आयत उन मूर्तियों और झूठे देवताओं की स्थिति स्पष्ट करती है जिन्हें मुशरिकीन (बहुदेववादी) अल्लाह के सिवा पुकारते हैं और उनकी पूजा करते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये मूर्तियाँ जिन्हें तुम अपना माबूद बनाते हो, वे किसी भी चीज़ को पैदा करने की शक्ति नहीं रखतीं, चाहे वह चीज़ कितनी ही छोटी और तुच्छ क्यों न हो। वे न तो किसी को जीवन दे सकती हैं, न मौत, न रिज़्क़, और न ही किसी भलाई या बुराई को पैदा कर सकती हैं।
इसके विपरीत, ये मूर्तियाँ स्वयं मख़लूक़ हैं — इंसानों द्वारा बनाई गई हैं। लोग अपने हाथों से पत्थर, लकड़ी या धातु को काटकर उन्हें आकार देते हैं, फिर उन्हें पूजने लगते हैं। यानी जो चीज़ खुद पैदा की गई हो, जो खुद किसी कारीगर की बनाई हुई हो, वह दूसरों को कैसे पैदा कर सकती है? क्या कोई समझदार इंसान उस चीज़ की पूजा कर सकता है जो उसके अपने हाथों की बनाई हो? यह बड़ी बेवकूफी और अज्ञानता की बात है कि इंसान खुद जिसे बनाता है, उसके आगे सिर झुकाए।
यह आयत मुशरिकीन की उस मानसिकता पर करारी चोट करती है जो पत्थर की मूर्तियों को खुदा का दर्जा देते थे। अल्लाह तआला उन्हें बताता है कि जो चीज़ खुद मख़लूक़ हो, वह ख़ालिक़ (पैदा करने वाला) कैसे हो सकती है? सृष्टि का काम केवल उसी का है जो स्वयं अज़ली (अनादि) हो, जो किसी से पैदा न हुआ हो और जिसने सब कुछ पैदा किया हो — वही अल्लाह है।
फ़ायदे और सबक़:
- तौहीद की पुख़्ता दलील: यह आयत हमें सिखाती है कि इबादत के लायक़ वही है जो पैदा करने की शक्ति रखता हो। जो खुद पैदा किया गया हो, वह इबादत का हक़दार नहीं हो सकता। यह एक सरल और तर्कसंगत दलील है जो हर समझदार इंसान के दिल में उतरती है।
- अक़्ल का इस्तेमाल: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इंसान को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना चाहिए। जब कोई चीज़ खुद बनाई हुई हो, तो उसकी पूजा करना अक़्ल के खिलाफ़ है। इस्लाम हमें अंधी पैरवी के बजाय सोच-समझकर सच्चाई को क़बूल करने की तरग़ीब देता है।
- अल्लाह की क़ुदरत का अहसास: जब हम देखते हैं कि यह विशाल ब्रह्मांड, आसमान, ज़मीन, पहाड़, समुद्र, पेड़-पौधे, जानवर और इंसान — सब कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, तो हमारा दिल उसकी अज़मत के आगे झुक जाता है। यह अहसास हमें अल्लाह का शुक्रगुज़ार बनाता है और उसकी इबादत की तरफ़ राग़िब करता है।
- शिर्क से बचाव: यह आयत हमें शिर्क के ख़तरे से आगाह करती है। जो इंसान अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारता है या उससे मदद माँगता है, वह उस चीज़ से उम्मीद लगाता है जो खुद बेबस और मजबूर है। यह सबक़ हमें सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा करने की तालीम देता है।
- इस्लाम की आसानी: इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम का अक़ीदा कितना साफ़ और आसान है — बस एक अल्लाह की इबादत करो जो सब कुछ पैदा करने वाला है। यही फ़ितरत का दीन है, और यही इंसान को सुकून और कामयाबी की राह दिखाता है।
📜 आयत 18-22 — अन-नहल
अनुवाद — अन-नहल 20
सूरा अन-नहल आयत 20 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो और जो कुछ…सूरा आयत 20/128 — अन-नहल النحل (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नहल सुनें, अन-नहल अनुवाद, अन-नहल mp3, अन-नहल pdf. आयत 18–22. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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