अल-इसरा · 32/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَا ۖ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا ۝٣٢
Wa laa taqrabuz zinaaa innahoo kaana faahishatanw wa saaa`a sabeelaa
📖 हिंदी अर्थ
और (देखो) ज़िना के पास भी न फटकना क्योंकि बेशक वह बड़ी बेहयाई का काम है और बहुत बुरा चलन है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لا تقربوا: निकट न जाओ, अर्थात् उसके निकट जाने वाले सभी रास्तों और साधनों से दूर रहो।
  • الزنا: व्यभिचार, अवैध यौन संबंध।
  • فاحشة: अत्यंत बुरा कर्म, वह कार्य जो स्पष्ट रूप से घृणित और लज्जाजनक हो।
  • ساء سبيلاً: बहुत बुरा मार्ग, अत्यंत निकृष्ट राह।

विस्तृत व्याख्या:

अल्लाह तआला इस आयत में ज़िना (व्यभिचार) से रोकते हुए कहते हैं कि उसके निकट भी मत जाओ। यह आदेश केवल स्वयं ज़िना करने से रोकने के लिए नहीं है, बल्कि उन सभी चीज़ों से रोकने के लिए है जो ज़िना की ओर ले जाती हैं—जैसे बुरी नज़र, अकेले में मिलना, उत्तेजक बातचीत, अश्लील सामग्री देखना, या ऐसे माहौल में जाना जहाँ यह बुराई फैलती है। यह एक निवारक दृष्टिकोण है, ताकि इंसान धीरे-धीरे उस गुनाह में न पड़ जाए।

फिर अल्लाह बताते हैं कि यह कर्म "फ़ाहिशा" है—अर्थात् अत्यंत घृणित, लज्जाजनक और स्पष्ट रूप से बुरा कार्य है, जिसे अक्ल-समझ रखने वाला हर इंसान बुरा जानता है। यह न केवल दुनिया में बदनामी और शर्मिंदगी का कारण बनता है, बल्कि आख़िरत में भी अल्लाह की यातना का सबब है। इसके अलावा, यह वंश (नस्ल) की पवित्रता को नष्ट करता है, परिवारों को तोड़ता है, और समाज में बीमारियाँ और अराजकता फैलाता है। इसलिए अल्लाह इसे "बुरा मार्ग" कहते हैं—ऐसा रास्ता जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में नुकसान पहुँचाता है।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इस्लाम सिर्फ़ गुनाह करने से नहीं रोकता, बल्कि उन रास्तों से भी रोकता है जो गुनाह तक ले जाते हैं। यह एक संपूर्ण नैतिक प्रणाली है जो इंसान की पवित्रता और सम्मान की रक्षा करती है।
  2. ज़िना से बचना इंसान की इज़्ज़त, परिवार की मज़बूती और समाज की सलामती के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह आदेश हमारी भलाई के लिए है, न कि हम पर बोझ डालने के लिए।
  3. इस्लाम हमें अपनी नज़र, अपने विचार और अपने कदमों को नियंत्रित करना सिखाता है, ताकि हम पاکیزہ زندگی گزاریں और अल्लाह की रज़ा प्राप्त करें।
  4. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह हमसे सच्चा प्रेम करता है, इसलिए वह हमें उन चीज़ों से दूर रखता है जो हमारे लिए हानिकारक हैं, और हमें उस रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ देता है जो हमें जन्नत और खुशहाली तक पहुँचाता है।


📜 आयत 30-34 — अल-इसरा

30إِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا
इसमें शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ (बढ़ा) देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग रखता है इसमें शक़ नहीं कि वह अपने बन्दों से बहुत बाख़बर और देखभाल रखने वाला है
31وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَاقٍ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَإِيَّاكُمْ ۚ إِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْئًا كَبِيرًا
और (लोगों) मुफलिसी (ग़रीबी) के ख़ौफ से अपनी औलाद को क़त्ल न करो (क्योंकि) उनको और तुम को (सबको) तो हम ही रोज़ी देते हैं बेशक औलाद का क़त्ल करना बहुत सख्त गुनाह है
32وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَا ۖ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا
और (देखो) ज़िना के पास भी न फटकना क्योंकि बेशक वह बड़ी बेहयाई का काम है और बहुत बुरा चलन है
33وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِف فِّي الْقَتْلِ ۖ إِنَّهُ كَانَ مَنصُورًا
और जिस जान का मारना ख़ुदा ने हराम कर दिया है उसके क़त्ल न करना मगर जायज़ तौर पर और जो शख़्श नाहक़ मारा जाए तो हमने उसके वारिस को (क़ातिल पर क़सास का क़ाबू दिया है तो उसे चाहिए कि क़त्ल (ख़ून का बदला लेने) में ज्यादती न करे बेशक वह मदद दिया जाएगा
34وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُ ۚ وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا
(कि क़त्ल ही करे और माफ न करे) और यतीम जब तक जवानी को पहुँचे उसके माल के क़रीब भी न पहुँच जाना मगर हाँ इस तरह पर कि (यतीम के हक़ में) बेहतर हो और एहद को पूरा करो क्योंकि (क़यामत में) एहद की ज़रुर पूछ गछ होगी
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अनुवाद — अल-इसरा 32

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Tuesday, August 18, 2026

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