अल-इसरा · 77/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
سُنَّةَ مَن قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِن رُّسُلِنَا ۖ وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا ۝٧٧
Sunnata man qad arsalnaa qablakamir Rusulinaa wa laa tajidu lisunnatinaa tahhweelaa
📖 हिंदी अर्थ
तुमसे पहले जितने रसूल हमने भेजे हैं उनका बराबर यही दस्तूर रहा है और जो दस्तूर हमारे (ठहराए हुए) हैं उनमें तुम तग्य्युर तबद्दुल (रद्दो बदल) न पाओगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سُنَّةَ: अल्लाह की स्थापित परंपरा और नियम।
  • تَحْوِيلًا: बदलाव, परिवर्तन या टाल-मटोल।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत अल्लाह तआला के उस स्थापित नियम (सुन्नत) की ओर संकेत करती है जो पहले भेजे गए सभी नबियों और रसूलों के संबंध में रहा है। अल्लाह का यह नियम है कि जब कोई क़ौम अपने नबी को झुठलाती है, उसे निकालती है या उसके साथ बुरा व्यवहार करती है, तो अल्लाह उस क़ौम पर अपनी यातना (अज़ाब) भेजता है और उन्हें विनष्ट कर देता है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की उस परंपरा का हिस्सा है जो हमेशा से चली आ रही है।

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को संबोधित करते हुए फ़रमाता है: "ऐ रसूल! आपको यक़ीन हो कि यही हमारी सुन्नत (नियम) है, और आप हमारी इस सुन्नत में कभी कोई बदलाव या परिवर्तन नहीं पाएँगे।" यानी अल्लाह का वादा अटल है, उसमें कोई कमी, बदली या टाल-मटोल नहीं हो सकती। जिस तरह पिछली उम्मतों के साथ हुआ, उसी तरह जो लोग आपको निकालेंगे या आपके साथ दुश्मनी करेंगे, उनका अंजाम भी विनाश ही होगा।

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को सांत्वना और आश्वासन दे रहे हैं कि आप अकेले नहीं हैं, बल्कि आपसे पहले भी कई नबी आए, उन्हें भी झुठलाया गया और सताया गया, लेकिन अल्लाह ने हमेशा अपने नबियों की मदद की और उनके विरोधियों को नष्ट कर दिया। यह अल्लाह का अटल नियम है, जो कभी नहीं बदलता।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला अपने नेक बंदों और अपने दीन की हमेशा मदद करता है। चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, चाहे दुश्मन कितने भी ताकतवर हों, अल्लाह का वादा सच्चा है। इसलिए हमें भी अपने ईमान पर मज़बूती से क़ायम रहना चाहिए और यक़ीन रखना चाहिए कि अल्लाह की मदद ज़रूर आएगी। यह आयत हमें सब्र, दृढ़ता और अल्लाह पर भरोसा करने की प्रेरणा देती है। जो लोग अल्लाह के दीन के खिलाफ साज़िश करते हैं, उनका अंजाम बुरा होता है, और यह अल्लाह का अपरिवर्तनीय नियम है। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में अल्लाह के इस नियम को याद रखें और हमेशा सत्य और नेकी के मार्ग पर चलें, क्योंकि अल्लाह सत्य का साथ देता है और असत्य को मिटा देता है।



📜 आयत 75-79 — अल-इसरा

75إِذًا لَّأَذَقْنَاكَ ضِعْفَ الْحَيَاةِ وَضِعْفَ الْمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيْنَا نَصِيرًا
और (अगर तुम ऐसा करते तो) उस वक्त हम तुमको ज़िन्दगी में भी और मरने पर भी दोहरे (अज़ाब) का मज़ा चखा देते और फिर तुम को हमारे मुक़ाबले में कोई मददगार भी न मिलता
76وَإِن كَادُوا لَيَسْتَفِزُّونَكَ مِنَ الْأَرْضِ لِيُخْرِجُوكَ مِنْهَا ۖ وَإِذًا لَّا يَلْبَثُونَ خِلَافَكَ إِلَّا قَلِيلًا
और ये लोग तो तुम्हें (सर ज़मीन मक्के) से दिल बर्दाश्त करने ही लगे थे ताकि तुम को वहाँ से (शाम की तरफ) निकाल बाहर करें और ऐसा होता तो तुम्हारे पीछे में ये लोग चन्द रोज़ के सिवा ठहरने भी न पाते
77سُنَّةَ مَن قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِن رُّسُلِنَا ۖ وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا
तुमसे पहले जितने रसूल हमने भेजे हैं उनका बराबर यही दस्तूर रहा है और जो दस्तूर हमारे (ठहराए हुए) हैं उनमें तुम तग्य्युर तबद्दुल (रद्दो बदल) न पाओगे
78أَقِمِ الصَّلَاةَ لِدُلُوكِ الشَّمْسِ إِلَىٰ غَسَقِ اللَّيْلِ وَقُرْآنَ الْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا
(ऐ रसूल) सूरज के ढलने से रात के अंधेरे तक नमाज़े ज़ोहर, अस्र, मग़रिब, इशा पढ़ा करो और नमाज़ सुबह (भी) क्योंकि सुबह की नमाज़ पर (दिन और रात दोनों के फरिश्तों की) गवाही होती है
79وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَّكَ عَسَىٰ أَن يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَّحْمُودًا
और रात के ख़ास हिस्से में नमाजे तहज्जुद पढ़ा करो ये सुन्नत तुम्हारी खास फज़ीलत हैं क़रीब है कि क़यामत के दिन ख़ुदा तुमको मक़ामे महमूद तक पहुँचा दे
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अनुवाद — अल-इसरा 77

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Tuesday, August 18, 2026

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