अल-बकरा · 146/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمْ ۖ وَإِنَّ فَرِيقًا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ۝١٤٦
Allazeena aatainaahumul kitaaba ya`rifoonahoo kamaa ya`rifoona abnaaa`ahum wa inna fareeqam minhum layaktumoonal haqqa wa hum ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
जिन लोगों को हमने किताब (तौरैत वग़ैरह) दी है वह जिस तरह अपने बेटों को पहचानते है उसी तरह तरह वह उस पैग़म्बर को भी पहचानते हैं और उन में कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो दीदए व दानिस्ता (जान बुझकर) हक़ बात को छिपाते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَعْرِفُونَهُ: वे उसे (मुहम्मद ﷺ को) पहचानते हैं।
  • كَتَمُوا: छिपाना, छुपाना।
  • الْحَقّ: सत्य, जो वास्तविकता पर आधारित हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन यहूदी विद्वानों और ईसाई पादरियों के बारे में बताती है जिन्हें अल्लाह ने तौरात और इंजील दी थी। वे अपनी इन किताबों में मुहम्मद ﷺ के वे स्पष्ट लक्षण और विशेषताएँ पढ़ते और जानते थे जो उनकी नबुव्वत की गवाही देती थीं। उनका यह ज्ञान इतना यकीनी और स्पष्ट था कि जिस तरह एक पिता अपने बेटे को पहचानता है और उसे किसी और से भ्रमित नहीं करता, उसी तरह वे मुहम्मद ﷺ को पहचानते थे। यह पहचान उनके लिए कोई अस्पष्ट या संदिग्ध बात नहीं थी, बल्कि उनकी किताबों में दिए गए स्पष्ट विवरणों के कारण यह उनके लिए प्रत्यक्ष सत्य था।

इसके बावजूद, उनमें से एक गिरोह—जो हठधर्मी और ईर्ष्या पर आधारित था—इस सत्य को जानते हुए भी छिपाता था। वे लोगों को मुहम्मद ﷺ की सच्चाई और उनके आने की खबरों से रोकते थे, और क़िबला के बदलने जैसी सच्ची बातों को भी झुठलाते थे। उनका यह छिपाना अज्ञानता की वजह से नहीं था, बल्कि वे पूरी तरह जानते हुए भी—अपनी दुनियावी चाहतों, रुतबे और ईर्ष्या के कारण—सत्य को जानबूझकर छिपा रहे थे।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सत्य को पहचानना और उसे मान लेना अलग बात है, और उस पर अमल करना अलग बात है। केवल ज्ञान होना काफी नहीं है, बल्कि सत्य के आगे सिर झुकाना और उसे फैलाना भी ज़रूरी है।
  2. ईर्ष्या और दुनियावी मोह इंसान को इतना अंधा कर सकते हैं कि वह साफ सच्चाई को भी जानबूझकर छिपाए और दूसरों को उससे दूर रखे। इसलिए हमें अपने दिल को इन बुराइयों से पाक रखना चाहिए।
  3. यह आयत मुहम्मद ﷺ की सच्चाई की एक बड़ी गवाही है, क्योंकि पहले की किताबों में उनकी पहचान के जो लक्षण बताए गए थे, वे सब पूरे हुए। यह हमारे ईमान को मजबूत करता है और हमें अल्लाह के रसूल ﷺ पर पूरा भरोसा दिलाता है।
  4. सत्य को छिपाना एक बड़ा गुनाह है, और अल्लाह ने ऐसा करने वालों को यहाँ सख्त तौर पर मलामत की है। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें हमेशा सच बोलना चाहिए और उसे फैलाना चाहिए, चाहे हमारे लिए कितना भी मुश्किल क्यों न हो।
  5. यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की निशानियाँ और उसके रसूलों की सच्चाई इतनी स्पष्ट होती है कि किसी भी समझदार इंसान के लिए उसे न मानने का कोई बहाना नहीं बचता।


📜 आयत 144-148 — अल-बकरा

144قَدْ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ ۖ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَاهَا ۚ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ ۗ وَإِنَّ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ
ऐ रसूल क़िबला बदलने के वास्ते बेशक तुम्हारा बार बार आसमान की तरफ मुँह करना हम देख रहे हैं तो हम ज़रुर तुम को ऐसे क़िबले की तरफ फेर देगें कि तुम निहाल हो जाओ अच्छा तो नमाज़ ही में तुम मस्ज़िदे मोहतरम काबे की तरफ मुँह कर लो और ऐ मुसलमानों तुम जहाँ कही भी हो उसी की तरफ़ अपना मुँह कर लिया करो और जिन लोगों को किताब तौरेत वगैरह दी गयी है वह बख़ूबी जानते हैं कि ये तबदील क़िबले बहुत बजा व दुरुस्त है और उस के परवरदिगार की तरफ़ से है और जो कुछ वह लोग करते हैं उस से ख़ुदा बेख़बर नही
145وَلَئِنْ أَتَيْتَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ بِكُلِّ آيَةٍ مَّا تَبِعُوا قِبْلَتَكَ ۚ وَمَا أَنتَ بِتَابِعٍ قِبْلَتَهُمْ ۚ وَمَا بَعْضُهُم بِتَابِعٍ قِبْلَةَ بَعْضٍ ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ ۙ إِنَّكَ إِذًا لَّمِنَ الظَّالِمِينَ
और अगर अहले किताब के सामने दुनिया की सारी दलीले पेश कर दोगे तो भी वह तुम्हारे क़िबले को न मानेंगें और न तुम ही उनके क़िबले को मानने वाले हो और ख़ुद अहले किताब भी एक दूसरे के क़िबले को नहीं मानते और जो इल्म क़ुरान तुम्हारे पास आ चुका है उसके बाद भी अगर तुम उनकी ख्वाहिश पर चले तो अलबत्ता तुम नाफ़रमान हो जाओगे
146الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمْ ۖ وَإِنَّ فَرِيقًا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
जिन लोगों को हमने किताब (तौरैत वग़ैरह) दी है वह जिस तरह अपने बेटों को पहचानते है उसी तरह तरह वह उस पैग़म्बर को भी पहचानते हैं और उन में कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो दीदए व दानिस्ता (जान बुझकर) हक़ बात को छिपाते हैं
147الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ
ऐ रसूल तबदीले क़िबला तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ है पस तुम कहीं शक करने वालों में से न हो जाना
148وَلِكُلٍّ وِجْهَةٌ هُوَ مُوَلِّيهَا ۖ فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ ۚ أَيْنَ مَا تَكُونُوا يَأْتِ بِكُمُ اللَّهُ جَمِيعًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
और हर फरीक़ के वास्ते एक सिम्त है उसी की तरफ वह नमाज़ में अपना मुँह कर लेता है पस तुम ऐ मुसलमानों झगड़े को छोड़ दो और नेकियों मे उन से लपक के आगे बढ़ जाओ तुम जहाँ कहीं होगे ख़ुदा तुम सबको अपनी तरफ ले आऐगा बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
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अनुवाद — अल-बकरा 146

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Tuesday, August 18, 2026

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