ताहा · 129/135
अनुवाद उच्चारण — ताहा
وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَكَانَ لِزَامًا وَأَجَلٌ مُّسَمًّى ۝١٢٩
Wa law laa Kalimatun sabaqat mir Rabbika lakaana lizaamanw wa ajalum musammaa
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से पहले ही एक वायदा और अज़ाब का) एक वक्त मुअय्युन न होता तो (उनकी हरकतों से) फ़ौरन अज़ाब का आना लाज़मी बात थी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • कलिमतुन (كَلِمَةٌ): अल्लाह का फैसला और हुक्म।
  • सबक़त (سَبَقَتْ): पहले से तय हो चुका है।
  • लिज़ामन (لِزَامًا): लाज़िमी और अनिवार्य आज़ाब जो उन्हें घेर ले।
  • अजलुन मुसम्मा (أَجَلٌ مُّسَمًّى): एक निश्चित और मुक़र्रर किया हुआ समय।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! अगर अल्लाह की तरफ से एक बात पहले से तय न हो चुकी होती, और एक मुक़र्रर किया हुआ वक़्त (क़यामत का दिन) मुक़र्रर न होता, तो इन काफ़िरों पर आज़ाब दुनिया में ही नाज़िल हो जाता और उन्हें हलाक कर देता। क्योंकि ये लोग अपने कुफ़्र और ज़ुल्म की वजह से उस आज़ाब के पूरी तरह हक़दार हैं। लेकिन अल्लाह ने अपनी हिकमत से उन्हें मोहलत दी है, ताकि उन पर हुज्जत क़ायम हो जाए, और उनके लिए एक मुक़र्रर वक़्त मुक़र्रर किया है — वो है क़यामत का दिन — जब उन्हें उनके आमाल का पूरा बदला मिलेगा।

यानी अल्लाह का ये फैसला कि आज़ाब को क़यामत तक के लिए मुल्तवी रखा जाए, और एक मुक़र्रर अजल जो उसने मुक़र्रर कर रखी है — इन दोनों चीज़ों की वजह से आज़ाब दुनिया में नहीं आता। अगर ये दोनों चीज़ें न होतीं, तो आज़ाब उन पर लाज़िम हो जाता और उन्हें घेर लेता।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें अल्लाह की रहमत और हिकमत का पता चलता है। अल्लाह जल्दी से अज़ाब नहीं देता, बल्कि बंदों को मौका देता है ताकि वे तौबा कर लें और अपनी ग़लतियों से बाज़ आ जाएँ। ये अल्लाह की बहुत बड़ी मेहरबानी है कि वो गुनाहगारों को फौरन पकड़ नहीं लेता, बल्कि उन्हें सुधरने का वक़्त देता है। हमें इस मोहलत से फ़ायदा उठाना चाहिए और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इताअत में गुज़ारना चाहिए। क़यामत का दिन ज़रूर आने वाला है, और उस दिन हर इंसान को उसके किए का हिसाब देना होगा। इसलिए आज ही अपने आपको सुधार लें और अल्लाह की रहमत के साये में आ जाएँ, क्योंकि अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए बहुत करीब है जो नेकी करते हैं।



📜 आयत 127-131 — ताहा

127وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي مَنْ أَسْرَفَ وَلَمْ يُؤْمِن بِآيَاتِ رَبِّهِ ۚ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبْقَىٰ
और जिसने (हद से) तजाविज़ किया और अपने परवरदिगार की आयतों पर ईमान न लाया उसको ऐसी ही बदला देगें और आख़िरत का अज़ाब तो यक़ीनी बहुत सख्त और बहुत देर पा है
128أَفَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ فِي مَسَاكِنِهِمْ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّأُولِي النُّهَىٰ
तो क्या उन (अहले मक्का) को उस (खुदा) ने ये नहीं बता दिया था कि हमने उनके पहले कितने लोगों को हलाक कर डाला जिनके घरों में ये लोग चलते फिरते हैं इसमें शक नहीं कि उसमें अक्लमंदों के लिए (कुदरते खुदा की) यक़ीनी बहुत सी निशानियाँ हैं
129وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَكَانَ لِزَامًا وَأَجَلٌ مُّسَمًّى
और (ऐ रसूल) अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से पहले ही एक वायदा और अज़ाब का) एक वक्त मुअय्युन न होता तो (उनकी हरकतों से) फ़ौरन अज़ाब का आना लाज़मी बात थी
130فَاصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا ۖ وَمِنْ آنَاءِ اللَّيْلِ فَسَبِّحْ وَأَطْرَافَ النَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضَىٰ
(ऐ रसूल) जो कुछ ये कुफ्फ़ार बका करते हैं तुम उस पर सब्र करो और आफ़ताब निकलने के क़ब्ल और उसके ग़ुरूब होने के क़ब्ल अपने परवरदिगार की हम्दोसना के साथ तसबीह किया करो और कुछ रात के वक़्तों में और दिन के किनारों में तस्बीह करो ताकि तुम निहाल हो जाओ
131وَلَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِّنْهُمْ زَهْرَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا لِنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَرِزْقُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ
और (ऐ रसूल) जो उनमें से कुछ लोगों को दुनिया की इस ज़रा सी ज़िन्दगी की रौनक़ से निहाल कर दिया है ताकि हम उनको उसमें आज़माएँ तुम अपनी नज़रें उधर न बढ़ाओ और (इससे) तुम्हारे परवरदिगार की रोज़ी (सवाब) कहीं बेहतर और ज्यादा पाएदार है
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अनुवाद — ताहा 129

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Tuesday, August 18, 2026

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