ताहा · 74/135
अनुवाद उच्चारण — ताहा
إِنَّهُ مَن يَأْتِ رَبَّهُ مُجْرِمًا فَإِنَّ لَهُ جَهَنَّمَ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ ۝٧٤
Innahoo mai yaati Rabbahoo mujriman fa inna lahoo Jahannama laa yamotu feehaa wa laa yahyaa
📖 हिंदी अर्थ
और (उसी को) सबसे ज्यादा क़याम है इसमें शक नहीं कि जो शख्स मुजरिम होकर अपने परवरदिगार के सामने हाज़िर होगा तो उसके लिए यक़ीनन जहन्नुम (धरा हुआ) है जिसमें न तो वह मरे ही गा और न ज़िन्दा ही रहेगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मुजरिमन (مجرمًا): अपराधी, अर्थात वह व्यक्ति जिसने कुफ्र और शिर्क के अपराध किए हों। यहाँ इसका अर्थ है काफिर और मुशरिक।
  • ला यमूतु फ़ीहा (لا يموت فيها): उसमें मृत्यु नहीं आएगी, अर्थात वह मरकर आराम नहीं पा सकेगा।
  • वला यह्या (ولا يحيى): और न ही वह ऐसी ज़िंदगी जिएगा जिसमें उसे कोई सुख या लाभ मिले।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में एक अत्यंत गंभीर और भयावह सत्य को स्पष्ट कर रहे हैं। वह फ़रमाते हैं कि जो व्यक्ति अपने रब के समक्ष उस हालत में हाज़िर होगा कि वह मुजरिम हो — यानी कुफ्र और शिर्क का अपराधी हो, अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराने वाला हो — तो उसका ठिकाना जहन्नम (नर्क) है। यह कोई साधारण सज़ा नहीं, बल्कि ऐसी सज़ा है जिसमें न मौत आती है और न ही ज़िंदगी का कोई सुख।

ग़ौर फ़रमाइए! इस आयत में अल्लाह ने जहन्नम की सज़ा को इस तरह बयान किया है कि वहाँ का अज़ाब न तो मौत के साथ ख़त्म होता है और न ही ज़िंदगी के साथ कोई राहत मिलती है। यानी वहाँ का निवासी न तो मरता है कि अज़ाब से छुटकारा पा जाए, और न ही उसे वह ज़िंदगी मिलती है जिसमें वह किसी तरह का सुख या आराम महसूस कर सके। यह एक ऐसी हालत है जो हर तरह की राहत से कटी हुई है — न मौत की राहत, न ज़िंदगी का लुत्फ़।

यह आयत हमें अल्लाह के दीन की ओर लौटने की दावत देती है। यह हमें चेतावनी देती है कि कुफ्र और शिर्क का अंजाम कितना भयानक है। लेकिन साथ ही यह भी बताती है कि अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खुला है — जो कोई भी इस हालत से तौबा करके अल्लाह की ओर लौटेगा, अल्लाह उसे माफ़ करने के लिए तैयार है।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी ज़िंदगी का मक़सद क्या है? क्या हम सिर्फ़ इस दुनिया की ख्वाहिशों में डूबे रहें, या फिर उस दिन की तैयारी करें जब हमें अपने रब के सामने खड़ा होना है? अल्लाह ने हमें इतनी बड़ी नेमत दी है — ईमान, इस्लाम, और क़ुरआन — कि हम उसके शुक्र अदा करें और अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा के मुताबिक़ बनाएं।

याद रखिए, अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से कहीं ज़्यादा वसी' है। जो शख्स भी अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह की तरफ़ रुजू' करता है, अल्लाह उसे गले लगाता है और उसके गुनाह माफ़ कर देता है। यही वह रास्ता है जो हमें जहन्नम के अज़ाब से बचाकर जन्नत की तरफ ले जाता है। अल्लाह हम सबको इस रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 72-76 — ताहा

72قَالُوا لَن نُّؤْثِرَكَ عَلَىٰ مَا جَاءَنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالَّذِي فَطَرَنَا ۖ فَاقْضِ مَا أَنتَ قَاضٍ ۖ إِنَّمَا تَقْضِي هَٰذِهِ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا
जादूगर बोले कि ऐसे वाजेए व रौशन मौजिज़ात जो हमारे सामने आए उन पर और जिस (खुदा) ने हमको पैदा किया उस पर तो हम तुमको किसी तरह तरजीह नहीं दे सकते तो जो तुझे करना हो कर गुज़र तो बस दुनिया की (इसी ज़रा) ज़िन्दगी पर हुकूमत कर सकता है
73إِنَّا آمَنَّا بِرَبِّنَا لِيَغْفِرَ لَنَا خَطَايَانَا وَمَا أَكْرَهْتَنَا عَلَيْهِ مِنَ السِّحْرِ ۗ وَاللَّهُ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ
(और कहा) हम तो अपने परवरदिगार पर इसलिए ईमान लाए हैं ताकि हमारे वास्ते सारे गुनाह माफ़ कर दे और (ख़ास कर) जिस पर तूने हमें मजबूर किया था और खुदा ही सबसे बेहतर है
74إِنَّهُ مَن يَأْتِ رَبَّهُ مُجْرِمًا فَإِنَّ لَهُ جَهَنَّمَ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ
और (उसी को) सबसे ज्यादा क़याम है इसमें शक नहीं कि जो शख्स मुजरिम होकर अपने परवरदिगार के सामने हाज़िर होगा तो उसके लिए यक़ीनन जहन्नुम (धरा हुआ) है जिसमें न तो वह मरे ही गा और न ज़िन्दा ही रहेगा
75وَمَن يَأْتِهِ مُؤْمِنًا قَدْ عَمِلَ الصَّالِحَاتِ فَأُولَٰئِكَ لَهُمُ الدَّرَجَاتُ الْعُلَىٰ
(सिसकता रहेगा) और जो शख्स उसके सामने ईमानदार हो कर हाज़िर होगा और उसने अच्छे-अच्छे काम भी किए होंगे तो ऐसे ही लोग हैं जिनके लिए बड़े-बड़े बुलन्द रूतबे हैं
76جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ مَن تَزَكَّىٰ
वह सदाबहार बाग़ात जिनके नीचे नहरें जारी हैं वह लोग उसमें हमेशा रहेंगे और जो गुनाह से पाक व पाकीज़ा रहे उस का यही सिला है
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अनुवाद — ताहा 74

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Tuesday, August 18, 2026

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