आल-इमरान · 25/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
فَكَيْفَ إِذَا جَمَعْنَاهُمْ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ۝٢٥
Fakaifa izaa jama`naahum li Yawmil laa raiba fee wa wuffiyat kullu nafsim maa kasabat wa hum laa yuzlamoon
📖 हिंदी अर्थ
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَكَيْفَ: तो कैसा होगा (उनका हाल)।
  • جَمَعْنَاهُمْ: हम उन्हें इकट्ठा करेंगे।
  • لِيَوْمٍ لَا رَيْبَ فِيهِ: उस दिन के लिए जिसमें कोई संदेह नहीं।
  • وُفِّيَتْ: पूरा-पूरा दिया जाएगा।
  • مَا كَسَبَتْ: जो कुछ उसने कमाया (अच्छे या बुरे कर्म)।
  • لَا يُظْلَمُونَ: उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा।

तफसीर (व्याख्या):

जब ये लोग (अहले-किताब) दुनिया में अपनी मनमानी करते हैं, झूठ बोलते हैं, और अल्लाह की आयतों को छिपाते हैं, तो उन्हें लगता है कि सब कुछ उनके बस में है। लेकिन उस दिन का अंदाज़ा लगाओ जब अल्लाह तआला सभी इंसानों को — पहले और आखिरी — एक मैदान में इकट्ठा करेगा। वह दिन ऐसा है जिसके आने में कोई शक नहीं, कोई संदेह नहीं। उस दिन हर व्यक्ति को उसके किए हुए कर्मों का पूरा-पूरा बदला मिलेगा — नेकी का बदला नेकी से, और गुनाह का बदला गुनाह के अनुसार।

उस दिन अल्लाह की रहमत और अद्ल का ऐसा नज़ारा होगा कि किसी पर ज़रा भी ज़ुल्म नहीं होगा। न किसी की नेकियाँ घटाई जाएँगी, न किसी के गुनाह बढ़ाए जाएँगे। हर शख्स को उसकी कमाई के मुताबिक ही मिलेगा। जिसने अच्छा किया, उसे अच्छा मिलेगा; जिसने बुरा किया, उसे बुरा मिलेगा। यह अल्लाह का पूरा इंसाफ़ है, जिसमें कोई कमी नहीं।


फ़ायदे (सबक):

  1. यक़ीन का पैगाम: यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि यह दुनिया ही सब कुछ नहीं है। एक दिन ज़रूर आएगा जब अल्लाह हर इंसान से उसके कर्मों का हिसाब लेगा। यह यक़ीन इंसान को ज़िम्मेदार बनाता है और उसे बुराई से रोकता है।
  2. अल्लाह का अद्ल: अल्लाह तआला बिल्कुल इंसाफ़ करने वाला है। उसके यहाँ किसी के साथ कोई धोखा नहीं होगा। यह बात इंसान के दिल को सुकून देती है कि अगर दुनिया में कोई ज़ुल्म सहना पड़े, तो आख़िरत में अल्लाह उसका पूरा हिसाब लेगा।
  3. कर्मों की अहमियत: हमारी असली कमाई हमारे अच्छे कर्म हैं। यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी ज़िंदगी को अच्छे कामों से भरना चाहिए, ताकि उस दिन हमारा पलड़ा भारी हो।
  4. ख़ौफ़ और उम्मीद: यह आयत एक तरफ़ अल्लाह के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाती है, तो दूसरी तरफ़ उसके इंसाफ़ की उम्मीद भी देती है। यही दोनों चीज़ें इंसान को सीधे रास्ते पर चलने में मदद करती हैं।
  5. दुनिया की आज़माइश: यह आयत हमें याद दिलाती है कि यह दुनिया एक इम्तिहान की जगह है। जो लोग यहाँ अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं, वे उस दिन पछताएँगे, लेकिन पछताने का वक़्त तब नहीं रहेगा। इसलिए आज ही अपने कर्मों को सुधार लें।


📜 आयत 23-27 — आल-इमरान

23أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُدْعَوْنَ إِلَىٰ كِتَابِ اللَّهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ وَهُم مُّعْرِضُونَ
(ऐ रसूल) क्या तुमने (उलमाए यहूद) के हाल पर नज़र नहीं की जिनको किताब (तौरेत) का एक हिस्सा दिया गया था (अब) उनको किताबे ख़ुदा की तरफ़ बुलाया जाता है ताकि वही (किताब) उनके झगड़ें का फैसला कर दे इस पर भी उनमें का एक गिरोह मुंह फेर लेता है और यही लोग रूगरदानी (मुँह फेरने) करने वाले हैं
24ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا لَن تَمَسَّنَا النَّارُ إِلَّا أَيَّامًا مَّعْدُودَاتٍ ۖ وَغَرَّهُمْ فِي دِينِهِم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
ये इस वजह से है कि वह लोग कहते हैं कि हमें गिनती के चन्द दिनों के सिवा जहन्नुम की आग हरगिज़ छुएगी भी तो नहीं जो इफ़तेरा परदाज़ी ये लोग बराबर करते आए हैं उसी ने उन्हें उनके दीन में भी धोखा दिया है
25فَكَيْفَ إِذَا جَمَعْنَاهُمْ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी
26قُلِ اللَّهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَن تَشَاءُ وَتَنزِعُ الْمُلْكَ مِمَّن تَشَاءُ وَتُعِزُّ مَن تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَن تَشَاءُ ۖ بِيَدِكَ الْخَيْرُ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(ऐ रसूल) तुम तो यह दुआ मॉगों कि ऐ ख़ुदा तमाम आलम के मालिक तू ही जिसको चाहे सल्तनत दे और जिससे चाहे सल्तनत छीन ले और तू ही जिसको चाहे इज्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे हर तरह की भलाई तेरे ही हाथ में है बेशक तू ही हर चीज़ पर क़ादिर है
27تُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَتُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ ۖ وَتُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ ۖ وَتَرْزُقُ مَن تَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
तू ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो) रात बढ़ जाती है और तू ही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है) तू ही बेजान (अन्डा नुत्फ़ा वगैरह) से जानदार को पैदा करता है और तू ही जानदार से बेजान नुत्फ़ा (वगैरहा) निकालता है और तू ही जिसको चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
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अनुवाद — आल-इमरान 25

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सूरा आयत 25/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 23–27. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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