Fakaifa izaa jama`naahum li Yawmil laa raiba fee wa wuffiyat kullu nafsim maa kasabat wa hum laa yuzlamoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी
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تو اس وقت کیا حال ہوگا جب ہم ان کو جمع کریں گے (یعنی) اس روز جس (کے آنے) میں کچھ بھی شک نہیں اور ہر نفس اپنے اعمال کا پورا پورا بدلہ پائے گا اور ان پر ظلم نہیں کیا جائے گا
لِيَوْمٍ لَا رَيْبَ فِيهِ: उस दिन के लिए जिसमें कोई संदेह नहीं।
وُفِّيَتْ: पूरा-पूरा दिया जाएगा।
مَا كَسَبَتْ: जो कुछ उसने कमाया (अच्छे या बुरे कर्म)।
لَا يُظْلَمُونَ: उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा।
तफसीर (व्याख्या):
जब ये लोग (अहले-किताब) दुनिया में अपनी मनमानी करते हैं, झूठ बोलते हैं, और अल्लाह की आयतों को छिपाते हैं, तो उन्हें लगता है कि सब कुछ उनके बस में है। लेकिन उस दिन का अंदाज़ा लगाओ जब अल्लाह तआला सभी इंसानों को — पहले और आखिरी — एक मैदान में इकट्ठा करेगा। वह दिन ऐसा है जिसके आने में कोई शक नहीं, कोई संदेह नहीं। उस दिन हर व्यक्ति को उसके किए हुए कर्मों का पूरा-पूरा बदला मिलेगा — नेकी का बदला नेकी से, और गुनाह का बदला गुनाह के अनुसार।
उस दिन अल्लाह की रहमत और अद्ल का ऐसा नज़ारा होगा कि किसी पर ज़रा भी ज़ुल्म नहीं होगा। न किसी की नेकियाँ घटाई जाएँगी, न किसी के गुनाह बढ़ाए जाएँगे। हर शख्स को उसकी कमाई के मुताबिक ही मिलेगा। जिसने अच्छा किया, उसे अच्छा मिलेगा; जिसने बुरा किया, उसे बुरा मिलेगा। यह अल्लाह का पूरा इंसाफ़ है, जिसमें कोई कमी नहीं।
फ़ायदे (सबक):
यक़ीन का पैगाम: यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि यह दुनिया ही सब कुछ नहीं है। एक दिन ज़रूर आएगा जब अल्लाह हर इंसान से उसके कर्मों का हिसाब लेगा। यह यक़ीन इंसान को ज़िम्मेदार बनाता है और उसे बुराई से रोकता है।
अल्लाह का अद्ल: अल्लाह तआला बिल्कुल इंसाफ़ करने वाला है। उसके यहाँ किसी के साथ कोई धोखा नहीं होगा। यह बात इंसान के दिल को सुकून देती है कि अगर दुनिया में कोई ज़ुल्म सहना पड़े, तो आख़िरत में अल्लाह उसका पूरा हिसाब लेगा।
कर्मों की अहमियत: हमारी असली कमाई हमारे अच्छे कर्म हैं। यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी ज़िंदगी को अच्छे कामों से भरना चाहिए, ताकि उस दिन हमारा पलड़ा भारी हो।
ख़ौफ़ और उम्मीद: यह आयत एक तरफ़ अल्लाह के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाती है, तो दूसरी तरफ़ उसके इंसाफ़ की उम्मीद भी देती है। यही दोनों चीज़ें इंसान को सीधे रास्ते पर चलने में मदद करती हैं।
दुनिया की आज़माइश: यह आयत हमें याद दिलाती है कि यह दुनिया एक इम्तिहान की जगह है। जो लोग यहाँ अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं, वे उस दिन पछताएँगे, लेकिन पछताने का वक़्त तब नहीं रहेगा। इसलिए आज ही अपने कर्मों को सुधार लें।
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी
(ऐ रसूल) क्या तुमने (उलमाए यहूद) के हाल पर नज़र नहीं की जिनको किताब (तौरेत) का एक हिस्सा दिया गया था (अब) उनको किताबे ख़ुदा की तरफ़ बुलाया जाता है ताकि वही (किताब) उनके झगड़ें का फैसला कर दे इस पर भी उनमें का एक गिरोह मुंह फेर लेता है और यही लोग रूगरदानी (मुँह फेरने) करने वाले हैं
ये इस वजह से है कि वह लोग कहते हैं कि हमें गिनती के चन्द दिनों के सिवा जहन्नुम की आग हरगिज़ छुएगी भी तो नहीं जो इफ़तेरा परदाज़ी ये लोग बराबर करते आए हैं उसी ने उन्हें उनके दीन में भी धोखा दिया है
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी
(ऐ रसूल) तुम तो यह दुआ मॉगों कि ऐ ख़ुदा तमाम आलम के मालिक तू ही जिसको चाहे सल्तनत दे और जिससे चाहे सल्तनत छीन ले और तू ही जिसको चाहे इज्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे हर तरह की भलाई तेरे ही हाथ में है बेशक तू ही हर चीज़ पर क़ादिर है
तू ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो) रात बढ़ जाती है और तू ही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है) तू ही बेजान (अन्डा नुत्फ़ा वगैरह) से जानदार को पैदा करता है और तू ही जानदार से बेजान नुत्फ़ा (वगैरहा) निकालता है और तू ही जिसको चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
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