आल-इमरान · 94/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
فَمَنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ۝٩٤
Famanif taraa `alal laahilkaziba mim ba`di zaalika fa ulaaa`ika humuz zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
और उसको (हमारे सामने) पढ़ो फिर उसके बाद भी जो कोई ख़ुदा पर झूठ तूफ़ान जोड़े तो (समझ लो) कि यही लोग ज़ालिम (हठधर्म) हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • افترى: झूठ गढ़ना, बदनामी करना, झूठ बाँधना।
  • الظالمون: अत्याचारी, जो अपनी जगह से हटकर दूसरे का हक़ मारें या खुद पर ज़ुल्म करें।

विस्तृत तफ़सीर:

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जिस किसी ने भी इस स्पष्ट सच्चाई और हुज्जत (प्रमाण) के आने के बाद अल्लाह पर झूठ बोला — यानी यह दावा किया कि अल्लाह ने यहूदियों के लिए कुछ चीज़ें हराम की हैं, जबकि हक़ीक़त यह है कि यहूदियों के बुज़ुर्ग हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने अपनी नफ़्सी ख़्वाहिश की वजह से कुछ चीज़ें खुद पर हराम कर ली थीं, अल्लाह की तरफ़ से कोई हुक्म नहीं था — तो ऐसे लोग ही सच्चे अत्याचारी हैं। यह ज़ुल्म दो तरह का है: एक तो यह कि उन्होंने अल्लाह पर झूठ बोलकर उसकी शान में बड़ी बदतमीज़ी की, और दूसरे यह कि उन्होंने खुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया, क्योंकि उन्होंने हक़ को छोड़ दिया जबकि हक़ उनके सामने साफ़ और रौशन हो चुका था। यह वह लोग हैं जो इंसाफ़ नहीं करते, न अल्लाह के साथ इंसाफ़ करते हैं और न अपनी रूह के साथ।

फ़ायदे:

  1. सच्चाई सामने आने के बाद उसे छुपाना या उसके खिलाफ़ झूठ फैलाना सबसे बड़ा ज़ुल्म है, और अल्लाह के नाम पर झूठ बोलना सबसे गंभीर गुनाह है।
  2. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि हमें कभी भी अल्लाह के नाम पर कोई बात नहीं कहनी चाहिए जब तक कि हमें पक्का इल्म न हो। दीन के मामले में अटकल और अफ़वाहों पर भरोसा करना ज़ुल्म है।
  3. अल्लाह का दीन आसान और फ़ितरत के मुताबिक़ है; इसमें कोई ऐसी बात नहीं जो इंसान अपनी तरफ़ से जोड़ ले। इसलिए हमें सिर्फ़ क़ुरआन और सही सुन्नत को ही अपना रहनुमा बनाना चाहिए।
  4. यह आयत हमें बताती है कि हक़ के सामने आने के बाद उसका इंकार करना इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है, और इंसाफ़ वाला रास्ता अपनाना ही कामयाबी की कुंजी है।
🎧 सुनें

📜 आयत 92-96 — आल-इमरान

92لَن تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ ۚ وَمَا تُنفِقُوا مِن شَيْءٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ
(लोगों) जब तक तुम अपनी पसन्दीदा चीज़ों में से कुछ राहे ख़ुदा में ख़र्च न करोगे हरगिज़ नेकी के दरजे पर फ़ायज़ नहीं हो सकते और तुम कोई
93۞ كُلُّ الطَّعَامِ كَانَ حِلًّا لِّبَنِي إِسْرَائِيلَ إِلَّا مَا حَرَّمَ إِسْرَائِيلُ عَلَىٰ نَفْسِهِ مِن قَبْلِ أَن تُنَزَّلَ التَّوْرَاةُ ۗ قُلْ فَأْتُوا بِالتَّوْرَاةِ فَاتْلُوهَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
सी चीज़ भी ख़र्च करो ख़ुदा तो उसको ज़रूर जानता है तौरैत के नाज़िल होने के क़ब्ल याकूब ने जो जो चीज़े अपने ऊपर हराम कर ली थीं उनके सिवा बनी इसराइल के लिए सब खाने हलाल थे (ऐ रसूल उन यहूद से) कह दो कि अगर तुम (अपने दावे में सच्चे हो तो तौरेत ले आओ
94فَمَنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
और उसको (हमारे सामने) पढ़ो फिर उसके बाद भी जो कोई ख़ुदा पर झूठ तूफ़ान जोड़े तो (समझ लो) कि यही लोग ज़ालिम (हठधर्म) हैं
95قُلْ صَدَقَ اللَّهُ ۗ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा ने सच फ़रमाया तो अब तुम मिल्लते इबराहीम (इस्लाम) की पैरवी करो जो बातिल से कतरा के चलते थे और मुशरेकीन से न थे
96إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِّلْعَالَمِينَ
लोगों (की इबादत) के वास्ते जो घर सबसे पहले बनाया गया वह तो यक़ीनन यही (काबा) है जो मक्के में है बड़ी (खैर व बरकत) वाला और सारे जहॉन के लोगों का रहनुमा
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अनुवाद — आल-इमरान 94

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Tuesday, August 18, 2026

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