अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الْجُرُزِ – सूखी, बंजर और कठोर भूमि जिसमें कोई वनस्पति न हो।
- نَسُوقُ – हम चलाते हैं, भेजते हैं (अर्थात् बादलों को या पानी को)।
- زَرْعًا – खेती, फसल, अनाज।
- أَنْعَامُهُمْ – उनके चौपाए (ऊँट, गाय, बकरी आदि)।
- أَفَلَا يُبْصِرُونَ – तो क्या वे देखते नहीं? (अर्थात् क्या वे इतना भी नहीं समझते?)
तफ़सीर:
क्या इन मुन्किरों (इन्कार करने वालों) ने कभी अपनी आँखों से नहीं देखा कि हम पानी को सूखी, बंजर और कठोर भूमि की ओर भेजते हैं — वह भूमि जो मर चुकी होती है, जिसमें कोई हरियाली नहीं होती, और फिर उसी पानी के ज़रिए हम तरह-तरह की फ़सलें उगाते हैं, जिनसे उनके चौपाए चरते हैं और वे खुद भी खाते हैं? क्या वे इन नेमतों को देखकर यह नहीं समझते कि जिसने इस बंजर ज़मीन को हरा-भरा कर दिया, वही मुर्दों को ज़िन्दा करके क़ब्रों से निकालने पर भी पूरी तरह क़ादिर है?
यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है — जब हम देखते हैं कि बारिश के बाद मरूभूमि भी हरी-भरी हो जाती है, तो क्या यह उसी शक्ति का प्रमाण नहीं कि जो ज़मीन को ज़िन्दा करता है, वही इंसान को भी दोबारा ज़िन्दा करेगा? यह कितनी बड़ी नेमत है कि अल्लाह हमारे लिए बादलों को चलाता है, पानी बरसाता है, और उससे हमारी रोज़ी पैदा करता है — हमारे जानवरों के लिए चारा और हमारे लिए अनाज, फल और सब्ज़ियाँ।
क्या हम इतना भी नहीं देखते? क्या हमारी आँखें इन निशानियों को पढ़ नहीं सकतीं? यदि हम सच्चे दिल से इन नेमतों पर ग़ौर करें, तो हमारा ईमान मज़बूत हो जाए और हमें यक़ीन हो जाए कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है — वही ज़मीन को सूखे के बाद हरा-भरा करता है, वही मुर्दों को ज़िन्दा करेगा और हमें उसके सामने हाज़िर होना है।
यह आयत हमें सिखाती है कि प्रकृति की हर चीज़ में अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हैं — बस ज़रूरत है देखने और समझने की। जो इन निशानियों को पढ़ लेता है, उसका दिल ईमान से भर जाता है और वह अल्लाह का शुक्रगुज़ार बन्दा बन जाता है।
📜 आयत 25-29 — अस-सजदा
अनुवाद — अस-सजदा 27
सूरा अस-सजदा आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या इन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया…सूरा आयत 27/30 — अस-सजदा السجدة (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अस-सजदा सुनें, अस-सजदा अनुवाद, अस-सजदा mp3, अस-सजदा pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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