अस-सजदा · 27/30
अनुवाद उच्चारण — अस-सजदा
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَسُوقُ الْمَاءَ إِلَى الْأَرْضِ الْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَامُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ ۝٢٧
Awalam yaraw annaa nasooqul maaa`a ilal lardil juruzi fanukhriju bihee zar`an taakulu minhu an`aamuhum wa anfusuhum afalaa yubsiroon
📖 हिंदी अर्थ
क्या इन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हम चटियल मैदान (इफ़तादा) ज़मीन की तरफ पानी को जारी करते हैं फिर उसके ज़रिए से हम घास पात लगाते हैं जिसे उनके जानवर और ये ख़ुद भी खाते हैं तो क्या ये लोग इतना भी नहीं देखते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْجُرُزِ – सूखी, बंजर और कठोर भूमि जिसमें कोई वनस्पति न हो।
  • نَسُوقُ – हम चलाते हैं, भेजते हैं (अर्थात् बादलों को या पानी को)।
  • زَرْعًا – खेती, फसल, अनाज।
  • أَنْعَامُهُمْ – उनके चौपाए (ऊँट, गाय, बकरी आदि)।
  • أَفَلَا يُبْصِرُونَ – तो क्या वे देखते नहीं? (अर्थात् क्या वे इतना भी नहीं समझते?)

तफ़सीर:

क्या इन मुन्किरों (इन्कार करने वालों) ने कभी अपनी आँखों से नहीं देखा कि हम पानी को सूखी, बंजर और कठोर भूमि की ओर भेजते हैं — वह भूमि जो मर चुकी होती है, जिसमें कोई हरियाली नहीं होती, और फिर उसी पानी के ज़रिए हम तरह-तरह की फ़सलें उगाते हैं, जिनसे उनके चौपाए चरते हैं और वे खुद भी खाते हैं? क्या वे इन नेमतों को देखकर यह नहीं समझते कि जिसने इस बंजर ज़मीन को हरा-भरा कर दिया, वही मुर्दों को ज़िन्दा करके क़ब्रों से निकालने पर भी पूरी तरह क़ादिर है?

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है — जब हम देखते हैं कि बारिश के बाद मरूभूमि भी हरी-भरी हो जाती है, तो क्या यह उसी शक्ति का प्रमाण नहीं कि जो ज़मीन को ज़िन्दा करता है, वही इंसान को भी दोबारा ज़िन्दा करेगा? यह कितनी बड़ी नेमत है कि अल्लाह हमारे लिए बादलों को चलाता है, पानी बरसाता है, और उससे हमारी रोज़ी पैदा करता है — हमारे जानवरों के लिए चारा और हमारे लिए अनाज, फल और सब्ज़ियाँ।

क्या हम इतना भी नहीं देखते? क्या हमारी आँखें इन निशानियों को पढ़ नहीं सकतीं? यदि हम सच्चे दिल से इन नेमतों पर ग़ौर करें, तो हमारा ईमान मज़बूत हो जाए और हमें यक़ीन हो जाए कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है — वही ज़मीन को सूखे के बाद हरा-भरा करता है, वही मुर्दों को ज़िन्दा करेगा और हमें उसके सामने हाज़िर होना है।

यह आयत हमें सिखाती है कि प्रकृति की हर चीज़ में अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हैं — बस ज़रूरत है देखने और समझने की। जो इन निशानियों को पढ़ लेता है, उसका दिल ईमान से भर जाता है और वह अल्लाह का शुक्रगुज़ार बन्दा बन जाता है।



📜 आयत 25-29 — अस-सजदा

25إِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَفْصِلُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
(ऐ रसूल) हसमें शक़ नहीं कि जिन बातों में लोग (दुनिया में) बाहम झगड़ते रहते हैं क़यामत के दिन तुम्हारा परवरदिगार क़तई फैसला कर देगा
26أَوَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ فِي مَسَاكِنِهِمْ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ ۖ أَفَلَا يَسْمَعُونَ
क्या उन लोगों को ये मालूम नहीं कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला जिन के घरों में ये लोग चल फिर रहें हैं बेशक उसमे (कुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं तो क्या ये लोग सुनते नहीं हैं
27أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَسُوقُ الْمَاءَ إِلَى الْأَرْضِ الْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَامُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ
क्या इन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हम चटियल मैदान (इफ़तादा) ज़मीन की तरफ पानी को जारी करते हैं फिर उसके ज़रिए से हम घास पात लगाते हैं जिसे उनके जानवर और ये ख़ुद भी खाते हैं तो क्या ये लोग इतना भी नहीं देखते
28وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और ये लोग कहते है कि अगर तुम लोग सच्चे हो (कि क़यामत आएगी) तो (आख़िर) ये फैसला कब होगा
29قُلْ يَوْمَ الْفَتْحِ لَا يَنفَعُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِيمَانُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि फैसले के दिन कुफ्फ़ार को उनका ईमान लाना कुछ काम न आएगा और न उनको (इसकी) मोहलत दी जाएगी
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अनुवाद — अस-सजदा 27

सूरा अस-सजदा आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या इन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया…

सूरा आयत 27/30 — अस-सजदा السجدة (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अस-सजदा सुनें, अस-सजदा अनुवाद, अस-सजदा mp3, अस-सजदा pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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