अस-सजदा · 28/30
अनुवाद उच्चारण — सूरा अस-सजदा
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ۝٢٨
Wa yaqooloona mataa haazal fat hu in kuntum saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
और ये लोग कहते है कि अगर तुम लोग सच्चे हो (कि क़यामत आएगी) तो (आख़िर) ये फैसला कब होगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْفَتْحُ: यहाँ इसका अर्थ है निर्णय, फ़ैसला या विजय। अर्थात् वह दिन जब अल्लाह सत्य और असत्य के बीच अंतिम निर्णय करेगा।

तफ़सीर:

ये मुशरिकीन (बहुदेववादी) जो क़ियामत और हिसाब-किताब को झुठलाते थे, वे मज़ाक़ और उपहास के तौर पर कहते थे: "वह फ़तह (निर्णय/विजय) कब आएगी जिसकी तुम हमें धमकी देते हो? अगर तुम सच्चे हो तो बताओ, वह दिन कब है?"

वे इस तरह से रसूलुल्लाह ﷺ और मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाते थे और जल्दबाज़ी में अज़ाब (यातना) की माँग करते थे। उनका कहना था: "अगर तुम सच्चे हो कि हम पर अल्लाह का अज़ाब आएगा और हमारा अंजाम बुरा होगा, तो वह समय कब है? हमें दिखाओ!"

अल्लाह तआला ने इस आयत में उनकी इसी जल्दबाज़ी और उपहास का ज़िक्र किया है। यह उनकी नादानी और सरकशी की सबसे बड़ी निशानी थी कि वे उस चीज़ को मज़ाक़ में माँग रहे थे जो उनके लिए बहुत भयानक और विनाशकारी थी।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है कि हमें अल्लाह के वादों पर पूरा यक़ीन रखना चाहिए। अल्लाह का वादा सच्चा है, चाहे वह कितना ही देर से क्यों न पूरा हो। जिस तरह ये लोग मज़ाक़ उड़ाते थे और जल्दबाज़ी करते थे, उसी तरह आज भी कुछ लोग क़ियामत और अल्लाह के अज़ाब का मज़ाक़ उड़ाते हैं। लेकिन अल्लाह ने क़ुरआन में साफ़ कहा है कि वह दिन ज़रूर आएगा, और जब आएगा तो कोई उसे टाल नहीं सकेगा।

एक मोमिन के लिए यह बात बहुत अहम है कि वह अल्लाह के वादों पर भरोसा रखे और उन लोगों की बातों से विचलित न हो जो मज़ाक़ उड़ाते हैं। अल्लाह का फ़ैसला बिल्कुल सही और न्यायपूर्ण होगा, और वह दिन हर उस चीज़ से बेहतर होगा जो हम इस दुनिया में हासिल कर सकते हैं।



📜 आयत 26-30 — सूरा अस-सजदा

26أَوَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ فِي مَسَاكِنِهِمْ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ ۖ أَفَلَا يَسْمَعُونَ
क्या उन लोगों को ये मालूम नहीं कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला जिन के घरों में ये लोग चल फिर रहें हैं बेशक उसमे (कुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं तो क्या ये लोग सुनते नहीं हैं
27أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَسُوقُ الْمَاءَ إِلَى الْأَرْضِ الْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَامُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ
क्या इन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हम चटियल मैदान (इफ़तादा) ज़मीन की तरफ पानी को जारी करते हैं फिर उसके ज़रिए से हम घास पात लगाते हैं जिसे उनके जानवर और ये ख़ुद भी खाते हैं तो क्या ये लोग इतना भी नहीं देखते
28وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और ये लोग कहते है कि अगर तुम लोग सच्चे हो (कि क़यामत आएगी) तो (आख़िर) ये फैसला कब होगा
29قُلْ يَوْمَ الْفَتْحِ لَا يَنفَعُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِيمَانُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि फैसले के दिन कुफ्फ़ार को उनका ईमान लाना कुछ काम न आएगा और न उनको (इसकी) मोहलत दी जाएगी
30فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَانتَظِرْ إِنَّهُم مُّنتَظِرُونَ
ग़रज़ तुम उनकी बातों का ख्याल छोड़ दो और तुम मुन्तज़िर रहो (आख़िर) वह लोग भी तो इन्तज़ार कर रहे हैं
अस-सजदाकुरान सूची
30आयत
मक्कीअवतरण स्थान
28आयत

अनुवाद — अस-सजदा 28

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Friday, October 2, 2026

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