अस-सजदा · 29/30
अनुवाद उच्चारण — अस-सजदा
قُلْ يَوْمَ الْفَتْحِ لَا يَنفَعُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِيمَانُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ۝٢٩
Qul yawmal fat hi laa yanfa`ul lazeena kafarooo eemaanuhum wa laa hum yunzaroon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि फैसले के दिन कुफ्फ़ार को उनका ईमान लाना कुछ काम न आएगा और न उनको (इसकी) मोहलत दी जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَوْمَ الْفَتْحِ: निर्णय का दिन, अर्थात् क़ियामत का दिन जब सत्य और असत्य के बीच अंतिम फ़ैसला होगा।
  • لَا يَنفَعُ: कोई लाभ नहीं देगा, काम नहीं आएगा।
  • يُنظَرُونَ: उन्हें मोहलत दी जाएगी, देर की जाएगी, या उन्हें फिर से मौका दिया जाएगा।

विस्तृत तफ़सीर:

ऐ नबी! आप इन काफ़िरों से कह दीजिए कि जिस दिन का वादा किया जा रहा है, वह "फ़तह" (निर्णय और फ़ैसले) का दिन है—यानी क़ियामत का दिन। उस दिन अल्लाह तआला सच्चे और झूठे के बीच अंतिम फ़ैसला करेगा, और मोमिनीन को काफ़िरों पर पूरी विजय और स्पष्ट प्रभुत्व प्रदान करेगा।

उस दिन जो लोग दुनिया में अल्लाह और उसके रसूल को नकारते रहे, उनका ईमान लाना बिल्कुल भी काम नहीं आएगा। क्योंकि ईमान तो उसी वक़्त क़बूल होता है जब वह ग़ैब (परोक्ष) पर विश्वास करके लाया जाए, न कि जब आँखों से आज़ाब और मौत को देख लिया जाए। जब वे क़ियामत के मंज़र देख लेंगे, तो उनका यह देर से किया गया ईमान उन्हें किसी भी अज़ाब से नहीं बचा सकेगा।

और न ही उन्हें कोई मोहलत दी जाएगी—न तो तौबा करने के लिए, न पलटने के लिए, और न ही दुनिया में लौटकर अच्छे कर्म करने के लिए। वह दिन ऐसा दिन होगा जब हर आँख खुल जाएगी, हर पर्दा उठ जाएगा, और हर राज़ खुल जाएगा, लेकिन तब खुलने वाली आँखें और सुनने वाले कान किसी काम के नहीं रहेंगे।


दावती पहलू (नसीहत):

यह आयत हम मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है कि हम उस दिन का इंतज़ार न करें जब ईमान लाना बेकार हो जाए। आज हमारे पास ज़िंदगी है, दिल है, और तौबा का दरवाज़ा खुला है। अल्लाह तआला अपनी रहमत से हमें मौका दे रहा है कि हम अपने गुनाहों से तौबा करें, अपने ईमान को मज़बूत करें, और अच्छे कर्म करें।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि ईमान की क़ीमत उस वक़्त है जब वह दिल की गहराई से, बिना देखे, सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा करके लाया जाए। आइए हम आज ही अपने रब की तरफ़ रुजू करें, अपनी ज़िंदगी को सुधारें, और उस दिन की शर्मिंदगी से बचें जब ईमान और तौबा दोनों बेकार हो जाएंगे। अल्लाह हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 27-30 — अस-सजदा

27أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَسُوقُ الْمَاءَ إِلَى الْأَرْضِ الْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَامُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ
क्या इन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हम चटियल मैदान (इफ़तादा) ज़मीन की तरफ पानी को जारी करते हैं फिर उसके ज़रिए से हम घास पात लगाते हैं जिसे उनके जानवर और ये ख़ुद भी खाते हैं तो क्या ये लोग इतना भी नहीं देखते
28وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और ये लोग कहते है कि अगर तुम लोग सच्चे हो (कि क़यामत आएगी) तो (आख़िर) ये फैसला कब होगा
29قُلْ يَوْمَ الْفَتْحِ لَا يَنفَعُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِيمَانُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि फैसले के दिन कुफ्फ़ार को उनका ईमान लाना कुछ काम न आएगा और न उनको (इसकी) मोहलत दी जाएगी
30فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَانتَظِرْ إِنَّهُم مُّنتَظِرُونَ
ग़रज़ तुम उनकी बातों का ख्याल छोड़ दो और तुम मुन्तज़िर रहो (आख़िर) वह लोग भी तो इन्तज़ार कर रहे हैं
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अनुवाद — अस-सजदा 29

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Tuesday, August 18, 2026

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