फातिर · 20/45
अनुवाद उच्चारण — फातिर
وَلَا الظُّلُمَاتُ وَلَا النُّورُ ۝٢٠
Wa laz zulumaatu wa lannoon
📖 हिंदी अर्थ
और न अंधेरा (कुफ्र) और उजाला (ईमान) बराबर है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الظُّلُمَات (अंधेरे): यहाँ इससे कुफ्र और शिर्क की अंधेरियाँ मुराद हैं।
  • النُّور (प्रकाश): यहाँ इससे ईमान और हिदायत का नूर मुराद है।

तफ़सीर:

इस आयत में अल्लाह तआला ने ईमान और कुफ्र के बीच के फ़र्क़ को बयान किया है। जिस तरह अंधेरा और उजाला कभी एक नहीं हो सकते, उसी तरह ईमान की रौशनी और कुफ्र की अंधेरियाँ भी कभी बराबर नहीं हो सकतीं। यहाँ अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि जो शख्स अपनी आँखों से सच्चाई देख ले और हक़ को क़बूल कर ले, वह उस इंसान के बराबर नहीं हो सकता जो अंधा बना रहे और हक़ से मुँह मोड़े।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान की हालत और कुफ्र की हालत में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। ईमान इंसान को ज़िन्दगी देता है, उसके दिल को रौशन करता है और उसे सही रास्ते पर चलाता है। जबकि कुफ्र दिल को मुर्दा कर देता है, उसे अंधेरों में भटका देता है और इंसान को हलाकत की तरफ ले जाता है।

अल्लाह तआला ने इस आयत में हमें दावत दी है कि हम अपने दिलों को ईमान के नूर से रौशन करें, क्योंकि यही नूर हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देगा। जो लोग इस नूर को क़बूल कर लेते हैं, वही असल में ज़िन्दा दिल वाले हैं, और जो इससे इनकार करते हैं, वह मुर्दा दिल वाले हैं।

याद रखिए, अल्लाह तआला ने अपने रसूल को इसी नूर के साथ भेजा ताकि वह लोगों को अंधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ लाएँ। यह सबसे बड़ी नेमत है कि हमें यह नूर मिला है, और हमें इस नेमत की क़द्र करनी चाहिए और अपनी ज़िन्दगी को इसी नूर के हिसाब से ढालना चाहिए।

अल्लाह तआला हम सबको इस नूर पर साबित क़दम रखने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 18-22 — फातिर

18وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۚ وَإِن تَدْعُ مُثْقَلَةٌ إِلَىٰ حِمْلِهَا لَا يُحْمَلْ مِنْهُ شَيْءٌ وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَىٰ ۗ إِنَّمَا تُنذِرُ الَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِالْغَيْبِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ ۚ وَمَن تَزَكَّىٰ فَإِنَّمَا يَتَزَكَّىٰ لِنَفْسِهِ ۚ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ
और याद रहे कि कोई शख्स किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा और अगर कोई (अपने गुनाहों का) भारी बोझ उठाने वाला अपना बोझ उठाने के वास्ते (किसी को) बुलाएगा तो उसके बारे में से कुछ भी उठाया न जाएगा अगरचे (कोई किसी का) कराबतदार ही (क्यों न) हो (ऐ रसूल) तुम तो बस उन्हीं लोगों को डरा सकते हो जो बे देखे भाले अपने परवरदिगार का ख़ौफ रखते हैं और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ते हैं और (याद रखो कि) जो शख्स पाक साफ रहता है वह अपने ही फ़ायदे के वास्ते पाक साफ रहता है और (आख़िरकार सबको हिरफिर के) खुदा ही की तरफ जाना है
19وَمَا يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ
और अन्धा (क़ाफिर) और ऑंखों वाला (मोमिन किसी तरह) बराबर नहीं हो सकते
20وَلَا الظُّلُمَاتُ وَلَا النُّورُ
और न अंधेरा (कुफ्र) और उजाला (ईमान) बराबर है
21وَلَا الظِّلُّ وَلَا الْحَرُورُ
और न छाँव (बेहिश्त) और धूप (दोज़ख़ बराबर है)
22وَمَا يَسْتَوِي الْأَحْيَاءُ وَلَا الْأَمْوَاتُ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُسْمِعُ مَن يَشَاءُ ۖ وَمَا أَنتَ بِمُسْمِعٍ مَّن فِي الْقُبُورِ
और न ज़िन्दे (मोमिनीन) और न मुर्दें (क़ाफिर) बराबर हो सकते हैं और खुदा जिसे चाहता है अच्छी तरह सुना (समझा) देता है और (ऐ रसूल) जो (कुफ्फ़ार मुर्दों की तरह) क़ब्रों में हैं उन्हें तुम अपनी (बातें) नहीं समझा सकते हो
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अनुवाद — फातिर 20

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Tuesday, August 18, 2026

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