अज़-ज़ुखरुफ · 5/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا أَن كُنتُمْ قَوْمًا مُّسْرِفِينَ ۝٥
Afanadribu `ankumuz Zikra safhan an kuntum qawmam musrifeen
📖 हिंदी अर्थ
भला इस वजह से कि तुम ज्यादती करने वाले लोग हो हम तुमको नसीहत करने से मुँह मोड़ेंगे (हरगिज़ नहीं)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا: क्या हम तुमसे क़ुरआन की शिक्षा और नसीहत को रोक दें, यानी तुम्हें छोड़ दें और तुम्हारी ओर से मुँह मोड़ लें?
  • صَفْحًا: यहाँ इसका अर्थ है "छोड़ देना" या "दरगुज़र करना", यानी किसी चीज़ को पूरी तरह त्याग देना।
  • مُسْرِفِينَ: हद से बढ़ने वाले, यानी कु़फ़्र और गुनाहों में इंतिहा करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों से पूछ रहे हैं: क्या हम तुम्हारे इस हाल की वजह से कि तुम कु़फ़्र और गुनाहों में हद से बढ़ गए हो, तुम्हारी तरफ़ से क़ुरआन और नसीहत को रोक दें? क्या हम तुम्हें उनके हाल पर छोड़ दें और तुम पर हुज्जत क़ाइम न करें?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब साफ़ है: हरगिज़ नहीं! अल्लाह तआला अपनी रहमत और करम से तुम पर क़ुरआन उतारता रहेगा, चाहे तुम कितना भी इनकार और सरकशी क्यों न करो। अल्लाह की रहमत उसके ग़ज़ब से पहले है, और वह अपने बंदों को मौका देता है, ताकि वे रूजू करें और हिदायत पाएँ।

यह आयत अल्लाह की उस महान रहमत की तरफ़ इशारा करती है जो वह अपने बंदों पर करता है। अगर अल्लाह चाहता तो जब लोग इनकार करते, तो वह उन पर से अपनी नेमतें रोक लेता और उन्हें उनके हाल पर छोड़ देता। लेकिन अल्लाह की शान इससे बहुत ऊँची है — वह अपने बंदों पर रहमत और एहसान करता रहता है, उन्हें किताब और हिदायत भेजता रहता है, ताकि वे अंधेरों से निकलकर रौशनी की तरफ़ आएँ।

दावती पहलू:

यह आयत हमें अल्लाह की असीम रहमत और मेहरबानी पर ग़ौर करने की तरफ़ बुलाती है। जब हम गुनाहों में डूबे होते हैं, तो शैतान हमें यह वहम देता है कि अल्लाह ने हमें छोड़ दिया है, लेकिन यह आयत उस झूठ का जवाब है। अल्लाह तआला अपने बंदों से इतना प्यार करता है कि उनके इनकार के बावजूद उन पर क़ुरआन उतारता रहता है, उन्हें नसीहत भेजता रहता है। यह हमारे लिए कितनी बड़ी ख़ुशख़बरी है कि अल्लाह का दरवाज़ा हमेशा खुला है, और वह हमारी तौबा का इंतज़ार कर रहा है।

तो आइए, हम इस रहमत का फ़ायदा उठाएँ, क़ुरआन की तरफ़ रूजू करें, और अल्लाह की रहमत के साये में आकर अपनी ज़िंदगी को रौशन करें। अल्लाह कभी अपने बंदों से निराश नहीं होता, बल्कि वह हमेशा उन्हें बुलाता है कि "ऐ मेरे बंदो, मेरी तरफ़ आओ, मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा।"



📜 आयत 3-7 — अज़-ज़ुखरुफ

3إِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
हमने इस किताब को अरबी ज़बान कुरान ज़रूर बनाया है ताकि तुम समझो
4وَإِنَّهُ فِي أُمِّ الْكِتَابِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ
और बेशक ये (क़ुरान) असली किताब (लौह महफूज़) में (भी जो) मेरे पास है लिखी हुई है (और) यक़ीनन बड़े रूतबे की (और) पुरअज़ हिकमत है
5أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا أَن كُنتُمْ قَوْمًا مُّسْرِفِينَ
भला इस वजह से कि तुम ज्यादती करने वाले लोग हो हम तुमको नसीहत करने से मुँह मोड़ेंगे (हरगिज़ नहीं)
6وَكَمْ أَرْسَلْنَا مِن نَّبِيٍّ فِي الْأَوَّلِينَ
और हमने अगले लोगों को बहुत से पैग़म्बर भेजे थे
7وَمَا يَأْتِيهِم مِّن نَّبِيٍّ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
और कोई पैग़म्बर उनके पास ऐसा नहीं आया जिससे इन लोगों ने ठट्ठे नहीं किए हो
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
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5आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 5

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Tuesday, August 18, 2026

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