अल-क़ियामा · 37/40
अनुवाद उच्चारण — अल-क़ियामा
أَلَمْ يَكُ نُطْفَةً مِّن مَّنِيٍّ يُمْنَىٰ ۝٣٧
Alam yaku nutfatam mim maniyyiny yumnaa
📖 हिंदी अर्थ
क्या वह (इब्तेदन) मनी का एक क़तरा न था जो रहम में डाली जाती है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नुत्फ़ा: पानी की एक बूँद, अर्थात् पुरुष का वीर्य।
  • मन्नी: वह पतला पानी जो पुरुष के शरीर से निकलता है और जिससे संतान पैदा होती है।
  • युम्ना: डाला जाता है, बहाया जाता है, अर्थात् रहम (गर्भाशय) में पहुँचाया जाता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में उस इंसान से सवाल कर रहा है जो आख़िरत और दोबारा जीवित होने का इनकार करता है। वह कहता है: क्या यह इंसान भूल गया कि वह किस चीज़ से पैदा हुआ था? क्या वह पहले एक बेहद कमज़ोर नुत्फ़ा (वीर्य की एक बूँद) नहीं था, जो मन्नी (वीर्य) से निकलकर माँ के रहम में डाला जाता है? यह वही मामूली सा पानी है जिसे कोई अहमियत नहीं दी जाती, लेकिन अल्लाह ने उसी से इस खूबसूरत इंसानी शक्ल को बनाया।

यह सवाल इंसान को उसकी हैसियत याद दिलाने के लिए है। जब इंसान यह देखता है कि वह एक कमज़ोर नुत्फ़े से पैदा हुआ, तो उसे समझना चाहिए कि जिस अल्लाह ने उसे पहली बार पैदा किया, वह उसे दोबारा ज़िंदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर है। यह कोई मुश्किल काम नहीं है। जिस रब ने पानी की एक बूँद से इंसान का पूरा शरीर, उसकी आँखें, कान, दिल, दिमाग़ और हर अंग बनाया, क्या वह उसे दोबारा ज़िंदा नहीं कर सकता?

यह आयत इंसान को अपनी कमज़ोर शुरुआत पर ग़ौर करने की दावत देती है। जब इंसान अपनी पैदाइश के इस मामूली और कमज़ोर मरहले पर सोचता है, तो उसका ग़ुरूर और घमंड टूट जाता है। वह समझ जाता है कि उसे किसी बड़ी चीज़ से नहीं बल्कि एक तुच्छ बूँद से पैदा किया गया है। यही सोच उसे अल्लाह के सामने झुकने और उसकी क़ुदरत को क़बूल करने में मदद करती है।

अल्लाह तआला ने इंसान को यह याद दिलाकर उसे दोबारा जीवित होने पर ईमान लाने की तरफ़ बुलाया है। जो ख़ुदा इंसान को पहली बार पैदा कर सका, वह उसे दोबारा क्यों नहीं पैदा कर सकता? यह उसकी क़ुदरत के लिए बिल्कुल आसान है। इसलिए ऐ इंसान! अपनी पैदाइश के इस सफ़र पर ग़ौर कर, अपने रब की क़ुदरत को पहचान, और उस दिन के लिए तैयारी कर जब तू दोबारा ज़िंदा करके अपने रब के सामने पेश किया जाएगा। यही तेरी कामयाबी और नजात की राह है।

🎧 सुनें

📜 आयत 35-39 — अल-क़ियामा

35ثُمَّ أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰ
तुझ पर फिर तुफ़ है
36أَيَحْسَبُ الْإِنسَانُ أَن يُتْرَكَ سُدًى
क्या इन्सान ये समझता है कि वह यूँ ही छोड़ दिया जाएगा
37أَلَمْ يَكُ نُطْفَةً مِّن مَّنِيٍّ يُمْنَىٰ
क्या वह (इब्तेदन) मनी का एक क़तरा न था जो रहम में डाली जाती है
38ثُمَّ كَانَ عَلَقَةً فَخَلَقَ فَسَوَّىٰ
फिर लोथड़ा हुआ फिर ख़ुदा ने उसे बनाया
39فَجَعَلَ مِنْهُ الزَّوْجَيْنِ الذَّكَرَ وَالْأُنثَىٰ
फिर उसे दुरूस्त किया फिर उसकी दो किस्में बनायीं (एक) मर्द और (एक) औरत
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अनुवाद — अल-क़ियामा 37

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Tuesday, August 18, 2026

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