تَصْدِيَةً (तस्दियाह): ताली बजाना, एक हाथ को दूसरे हाथ पर मारना।
الْبَيْتِ (अल-बैत): यहाँ अर्थ है मस्जिद-ए-हराम (काबा)।
तफसीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला मक्का के मुशरिकों के उस कृत्य का वर्णन कर रहे हैं, जो वे बैतुल्लाह (काबा) के पास किया करते थे। उनकी नमाज़ या इबादत, जिसे वे अपनी पूजा कहते थे, केवल सीटी बजाना और ताली बजाना थी। वे काबा के पास आकर शोर मचाते, सीटियाँ बजाते और तालियाँ पीटते थे, ताकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और मुसलमानों को परेशान कर सकें और उनकी इबादत में खलल डाल सकें। यह उनकी इबादत का अंजाम था—न कोई वास्तविक नमाज़, न विनम्रता, बल्कि खेल-तमाशा और उपहास।
इसके बाद अल्लाह तआला ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा: "तो अब तुम इस कुफ्र और इन कार्यों के बदले में अज़ाब (यातना) का स्वाद चखो।" यह अज़ाब बद्र के दिन उन पर आया, जब वे मारे गए और बंदी बनाए गए। यह उनके कुफ्र और अल्लाह की आयतों को झुठलाने का परिणाम था।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
इबादत का वास्तविक अर्थ अल्लाह के सामने विनम्रता और खुशू (ध्यान) है, न कि शोर और खेल-तमाशा। अल्लाह उसी इबादत को क़ुबूल करता है जो सच्चे दिल और ख़ालिस नीयत से की जाए।
अल्लाह की इबादत का मज़ाक उड़ाना और उसमें रुकावट डालना बहुत बड़ा पाप है, और इसका अंजाम दुनिया और आख़िरत में बुरा होता है।
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नाराज़गी का सामना करने वालों को दुनिया में भी सज़ा मिल सकती है, जैसे बद्र के दिन मुशरिकों को मिली। इसलिए हमें अपने कर्मों की जाँच करते रहना चाहिए।
मुसलमानों को चाहिए कि वे अपनी नमाज़ और इबादत को सही तरीके से अदा करें, क्योंकि यही उनकी पहचान है और यही उन्हें अल्लाह के करीब लाती है।
हालॉकि जब तक तुम उनके दरमियान मौजूद हो ख़ुदा उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और ख़ुदा उन पर नाज़िल फरमाए
और जब ये लोग लोगों को मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा की इबादत) से रोकते है तो फिर उनके लिए कौन सी बात बाक़ी है कि उन पर अज़ाब न नाज़िल करे और ये लोग तो ख़ानाए काबा के मुतवल्ली भी नहीं (फिर क्यों रोकते है) इसके मुतवल्ली तो सिर्फ परहेज़गार लोग हैं मगर इन काफ़िरों में से बहुतेरे नहीं जानते
इसमें शक़ नहीं कि ये कुफ्फार अपने माल महज़ इस वास्ते खर्च करेगें फिर उसके बाद उनकी हसरत का बाइस होगा फिर आख़िर ये लोग हार जाएँगें और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तियार किया (क़यामत में) सब के सब जहन्नुम की तरफ हाके जाएँगें
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