अल-फज्र · 24/30
अनुवाद उच्चारण — अल-फज्र
يَقُولُ يَا لَيْتَنِي قَدَّمْتُ لِحَيَاتِي ۝٢٤
Yaqoolu yaa laitanee qaddamtu lihayaatee
📖 हिंदी अर्थ
(उस वक्त) क़हेगा कि काश मैने अपनी (इस) ज़िन्दगी के वास्ते कुछ पहले भेजा होता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَا لَيْتَنِي: काश! मैंने... (पछतावे और अफसोस का भाव)
  • قَدَّمْتُ: मैंने आगे भेजा होता (अर्थात पहले से भेज दिया होता)
  • لِحَيَاتِي: अपनी (सच्ची) ज़िंदगी के लिए

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इंसान को उसकी मृत्यु के बाद उसके कर्मों का हिसाब दिया जाएगा और वह अपने सामने अपने अच्छे और बुरे कर्मों को देखेगा, तो वह अत्यधिक पछतावे और शर्मिंदगी की हालत में कहेगा: "काश! मैंने अपनी इस (आख़िरत की) ज़िंदगी के लिए कुछ अच्छे कर्म पहले से भेज दिए होते!"

यह पुकार उस समय की होगी जब पछतावा किसी काम न आएगा। इंसान दुनिया में रहते हुए यह समझता था कि यही उसकी असली ज़िंदगी है, और वह दौलत, ओहदे और शारीरिक सुखों को ही सब कुछ मानता रहा। लेकिन जब आख़िरत का पर्दा खुलेगा और उसे सच्चाई का एहसास होगा, तो वह समझ जाएगा कि असली ज़िंदगी तो आख़िरत की ज़िंदगी है, जो कभी ख़त्म नहीं होती।

यह अफसोस उस व्यक्ति का होगा जिसने दुनिया में नमाज़, रोज़ा, ज़कात, सदक़ा, नेकी, ईमान और अच्छे आचरण जैसे कर्मों को आगे नहीं भेजा। वह देखेगा कि जो कुछ उसने दुनिया में जमा किया था—धन, संपत्ति, शोहरत—वह सब यहीं रह गया और उसके पास आख़िरत के लिए कुछ भी नहीं है।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें आज ही सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपनी असली ज़िंदगी के लिए क्या भेज रहे हैं? क्या हम केवल दुनिया की चमक-दमक में लगे हैं, या हमने अपनी आख़िरत के लिए भी कुछ नेकियाँ जमा की हैं?

याद रखिए, यह दुनिया एक मौसम की तरह है जो गुज़र जाती है, लेकिन आख़िरत की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली है। आज हमारे पास मौका है कि हम अपने अच्छे कर्मों को आगे भेजें—एक सच्ची नमाज़, एक ईमानदारी से दिया गया सदक़ा, माता-पिता की सेवा, अच्छा आचरण, और सबसे बढ़कर अल्लाह पर पक्का ईमान। यही वह पूंजी है जो उस दिन हमारे काम आएगी जब न दौलत काम आएगी और न बेटे-बेटियाँ।

आइए! हम आज ही अपनी आख़िरत की तैयारी करें, ताकि उस दिन हमें यह कहने की नौबत न आए: "काश! मैंने अपनी ज़िंदगी के लिए कुछ भेजा होता!" अल्लाह हम सबको अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 22-26 — अल-फज्र

22وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا
और तुम्हारे परवरदिगार का हुक्म और फ़रिश्ते कतार के कतार आ जाएँगे
23وَجِيءَ يَوْمَئِذٍ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ الْإِنسَانُ وَأَنَّىٰ لَهُ الذِّكْرَىٰ
और उस दिन जहन्नुम सामने कर दी जाएगी उस दिन इन्सान चौंकेगा मगर अब चौंकना कहाँ (फ़ायदा देगा)
24يَقُولُ يَا لَيْتَنِي قَدَّمْتُ لِحَيَاتِي
(उस वक्त) क़हेगा कि काश मैने अपनी (इस) ज़िन्दगी के वास्ते कुछ पहले भेजा होता
25فَيَوْمَئِذٍ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُ أَحَدٌ
तो उस दिन ख़ुदा ऐसा अज़ाब करेगा कि किसी ने वैसा अज़ाब न किया होगा
26وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُ أَحَدٌ
और न कोई उसके जकड़ने की तरह जकड़ेगा
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अनुवाद — अल-फज्र 24

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Tuesday, August 18, 2026

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