यूनुस · 44/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا وَلَٰكِنَّ النَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ۝٤٤
Innal laaha laa yazlimun naasa shai`anw wa laakin nannaasa anfusahum yazlimoon
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा तो हरगिज़ लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता मगर लोग खुद अपने ऊपर (अपनी करतूत से) जुल्म किया करते है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يَظْلِمُ: अत्याचार नहीं करता, किसी का हक़ नहीं मारता।
  • شَيْئًا: कुछ भी, ज़रा सा भी।
  • أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ: स्वयं अपनी आत्माओं पर अत्याचार करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों पर किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं करता—न उनके गुनाहों में वृद्धि करता है, न उनकी नेकियों में कमी लाता है, और न उन्हें बिना किसी अपराध के दंड देता है। वह पूर्ण न्यायकारी और अपने सभी कार्यों में भला करने वाला है। उसकी ओर से कभी कोई अन्याय हो ही नहीं सकता, यहाँ तक कि एक ज़र्रा (कण) बराबर भी नहीं।

लेकिन लोग स्वयं अपनी आत्माओं पर अत्याचार करते हैं। वे कुफ़्र, अवज्ञा, हठधर्मिता और सत्य को स्वीकार न करने के कारण अपने आप को विनाश के गड्ढे में झोंक देते हैं। वे अपने रब के आदेशों की अवहेलना करके, उसके निषेधों का उल्लंघन करके और बुरे कर्मों को अपनाकर अपने ऊपर ही ज़ुल्म ढाते हैं। अल्लाह ने उन्हें सत्य का मार्ग दिखाया, लेकिन उन्होंने अस्वीकार किया; उन्हें सुधारने के लिए संदेश भेजे, लेकिन उन्होंने मुँह मोड़ा। इस प्रकार हानि और पीड़ा उनके अपने कर्मों का परिणाम है, न कि अल्लाह की ओर से कोई अन्याय।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. यह आयत हमें अल्लाह के न्याय और दया का विश्वास दिलाती है—वह कभी किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, इसलिए हमें उस पर पूर्ण भरोसा रखना चाहिए और उसके फ़ैसलों पर संतुष्ट रहना चाहिए।
  2. यह हमें आत्म-चिंतन की ओर प्रेरित करती है—जब भी हम पर कोई मुसीबत आए, तो पहले अपने कर्मों की समीक्षा करें, क्योंकि अक्सर हमारी परेशानियाँ हमारे अपने किए का परिणाम होती हैं।
  3. यह आयत हमें यह सिखाती है कि अल्लाह ने हमें स्वतंत्र इच्छा दी है, और हमारा भला या बुरा भाग्य हमारे अपने चुनावों पर निर्भर करता है—इसलिए हमें सद्बुद्धि से काम लेना चाहिए और सत्य को अपनाना चाहिए।
  4. यह हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की राह पर चलना हमारे लिए ही बेहतर है, और उसकी अवज्ञा करना हमारे लिए ही हानिकारक है—अल्लाह को किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, वह तो केवल हमारी भलाई चाहता है।


📜 आयत 42-46 — यूनुस

42وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا لَا يَعْقِلُونَ
और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो
43وَمِنْهُم مَّن يَنظُرُ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تَهْدِي الْعُمْيَ وَلَوْ كَانُوا لَا يُبْصِرُونَ
तुम कही बहरों को कुछ सुना सकते हो और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो तुम्हारी तरफ (टकटकी बाँधे) देखते हैं तो (क्या वह ईमान लाएँगें हरगिज़ नहीं) अगरचे उन्हें कुछ न सूझता हो तो तुम अन्धे को राहे रास्त दिखा दोगे
44إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا وَلَٰكِنَّ النَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
ख़ुदा तो हरगिज़ लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता मगर लोग खुद अपने ऊपर (अपनी करतूत से) जुल्म किया करते है
45وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ كَأَن لَّمْ يَلْبَثُوا إِلَّا سَاعَةً مِّنَ النَّهَارِ يَتَعَارَفُونَ بَيْنَهُمْ ۚ قَدْ خَسِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِلِقَاءِ اللَّهِ وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ
और जिस दिन ख़ुदा इन लोगों को (अपनी बारगाह में) जमा करेगा तो गोया ये लोग (समझेगें कि दुनिया में) बस घड़ी दिन भर ठहरे और आपस में एक दूसरे को पहचानेंगे जिन लोगों ने ख़ुदा की बारगाह में हाज़िर होने को झुठलाया वह ज़रुर घाटे में हैं और हिदायत याफता न थे
46وَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِي نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ اللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ
ऐ रसूल हम जिस जिस (अज़ाब) का उनसे वायदा कर चुके हैं उनमें से बाज़ ख्वाहा तुम्हें दिखा दें या तुमको (पहले ही दुनिया से) उठा ले फिर (आख़िर) तो उन सबको हमारी तरफ लौटना ही है फिर जो कुछ ये लोग कर रहे हैं ख़ुदा तो उस पर गवाह ही है
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अनुवाद — यूनुस 44

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Tuesday, August 18, 2026

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