यूसुफ · 103/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूसुफ
وَمَا أَكْثَرُ النَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِنِينَ ۝١٠٣
Wa maa aksarun naasi wa law harasta bimu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
तुम उनके पास मौजूद न थे और कितने ही चाहो मगर बहुतेरे लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مَا أَكْثَرُ النَّاسِ: अधिकतर लोग
  • حَرَصْتَ: तूने चाहा, तूने कोशिश की
  • بِمُؤْمِنِينَ: ईमान लाने वाले

व्याख्या:

ऐ नबी! तुम्हारी क़ौम के अधिकतर लोग, चाहे तुम कितना भी चाहो और उनके ईमान लाने के लिए कितनी भी कोशिश कर लो, फिर भी ईमान लाने वाले नहीं बनेंगे। यह बात केवल तुम्हारी क़ौम के बारे में नहीं है, बल्कि सामान्य रूप से अधिकतर लोगों की स्थिति यही है। उनमें से अधिकांश ईमान नहीं लाते, चाहे उन्हें कितना भी समझाया जाए और उनके लिए कितनी भी दलीलें पेश की जाएँ।

यह ईमान अल्लाह की मर्ज़ी और उसकी तौफ़ीक़ पर निर्भर है। अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है। नबी का काम केवल पहुँचाना है, हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है। इसलिए ऐ नबी! उनके ईमान न लाने पर तुम दुखी मत होओ और अपनी जान को हलाकत में मत डालो। तुम्हारी ज़िम्मेदारी केवल संदेश पहुँचाना है, जो तुमने पूरा कर दिया है।

फ़ायदे:

  1. नबी की मेहनत और लोगों की नाफ़रमानी: यह आयत हमें सिखाती है कि नबी ﷺ ने अपनी उम्मत की हिदायत के लिए हर संभव कोशिश की, लेकिन फिर भी अधिकतर लोग ईमान नहीं लाए। यह हमारे लिए सबक है कि हमें भी दूसरों को अच्छी बात पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, लेकिन परिणाम अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए।
  2. निराशा से बचाव: यह आयत उन लोगों के लिए तसल्ली है जो दूसरों को ईमान की दावत देते हैं और जब वे ईमान नहीं लाते तो दुखी होते हैं। यह सिखाती है कि हिदायत अल्लाह के हाथ में है, हमारा काम केवल पहुँचाना है।
  3. अल्लाह की मर्ज़ी का सम्मान: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की मर्ज़ी के आगे हमें सिर झुकाना चाहिए। जिसे अल्लाह हिदायत देना चाहता है, वही हिदायत पाता है। यह हमारे अंदर अल्लाह के प्रति समर्पण और विनम्रता पैदा करता है।
  4. दावत के काम में लगे रहने की प्रेरणा: भले ही अधिकतर लोग ईमान न लाएँ, लेकिन हमें अपने दावत के काम में लगे रहना चाहिए। जो लोग ईमान लाएँगे, वे हमारी मेहनत का फल हैं। यह आयत हमें निराश न होकर लगातार अच्छाई की ओर बुलाते रहने की प्रेरणा देती है।
  5. नबी ﷺ से मुहब्बत: यह आयत नबी ﷺ की उम्मत के प्रति उनकी गहरी चिंता और मुहब्बत को दर्शाती है। वे अपनी उम्मत के ईमान के लिए इतने परेशान थे कि अल्लाह ने उन्हें तसल्ली दी। यह हमारे दिलों में नबी ﷺ की मुहब्बत और बढ़ाती है।


📜 आयत 101-105 — सूरा यूसुफ

101۞ رَبِّ قَدْ آتَيْتَنِي مِنَ الْمُلْكِ وَعَلَّمْتَنِي مِن تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ ۚ فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَنتَ وَلِيِّي فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۖ تَوَفَّنِي مُسْلِمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ
(उसके बाद यूसुफ ने दुआ की ऐ परवरदिगार तूने मुझे मुल्क भी अता फरमाया और मुझे ख्वाब की बातों की ताबीर भी सिखाई ऐ आसमान और ज़मीन के पैदा करने वाले तू ही मेरा मालिक सरपरस्त है दुनिया में भी और आख़िरत में भी तू मुझे (दुनिया से) मुसलमान उठाये और मुझे नेको कारों में शामिल फरमा
102ذَٰلِكَ مِنْ أَنبَاءِ الْغَيْبِ نُوحِيهِ إِلَيْكَ ۖ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ أَجْمَعُوا أَمْرَهُمْ وَهُمْ يَمْكُرُونَ
(ऐ रसूल) ये किस्सा ग़ैब की ख़बरों में से है जिसे हम तुम्हारे पास वही के ज़रिए भेजते हैं (और तुम्हें मालूम होता है वरना जिस वक्त यूसुफ के भाई बाहम अपने काम का मशवरा कर रहे थे और (हलाक की) तदबीरे कर रहे थे
103وَمَا أَكْثَرُ النَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِنِينَ
तुम उनके पास मौजूद न थे और कितने ही चाहो मगर बहुतेरे लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं
104وَمَا تَسْأَلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَالَمِينَ
हालॉकि तुम उनसे (तबलीगे रिसालत का) कोई सिला नहीं मॉगते और ये (क़ुरान) तो सारे जहाँन के वास्ते नसीहत (ही नसीहत) है
105وَكَأَيِّن مِّنْ آيَةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ
और आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की क़ुदरत की) कितनी निशानियाँ हैं जिन पर ये लोग (दिन रात) ग़ुज़ारा करते हैं और उससे मुँह फेरे रहते हैं
यूसुफकुरान सूची
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अनुवाद — यूसुफ 103

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सूरा आयत 103/111 — सूरा यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूसुफ सुनें, सूरा यूसुफ अनुवाद, सूरा यूसुफ mp3, सूरा यूसुफ pdf. आयत 101–105. हिंदी अर्थ: اردو.





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Friday, October 2, 2026

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