यूसुफ · 22/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ ۝٢٢
Wa lammaa balagha ashuddahooo aatainaahu bukmanw wa `ilmaa; wa kazaa lika najzil muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
और जब यूसुफ अपनी जवानी को पहुँचे तो हमने उनको हुक्म (नुबूवत) और इल्म अता किया और नेकी कारों को हम यूँ ही बदला दिया करते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَشُدَّهُ: अपनी पूरी शारीरिक शक्ति और युवावस्था की परिपक्वता को प्राप्त करना।
  • حُكْمًا: समझ-बूझ, नबुव्वत (पैग़म्बरी) और मामलों को सही ढंग से निपटाने की क्षमता।
  • عِلْمًا: धर्म की गहरी समझ और फ़िक्ह (धार्मिक ज्ञान)।
  • الْمُحْسِنِينَ: वे लोग जो अल्लाह की इबादत में भलाई करते हैं, यानी उसे इस तरह से पूजते हैं जैसे वे उसे देख रहे हों, और अपने सभी कार्यों में अच्छाई अपनाते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) अपनी पूरी जवानी और शारीरिक शक्ति की परिपक्वता को पहुँचे — जो कि अधिकांश उलेमा के अनुसार लगभग तैंतीस वर्ष की आयु है — तो अल्लाह ने उन्हें दो महान चीज़ें प्रदान कीं:

पहली, हुक्म (निर्णय लेने की शक्ति और नबुव्वत): यानी उन्हें मामलों को सही ढंग से सुलझाने, न्याय करने और लोगों के बीच फ़ैसले करने की क्षमता दी गई। यह उनके लिए अल्लाह की ओर से एक विशेष सम्मान और पैग़म्बरी का दर्जा था।

दूसरी, इल्म (ज्ञान): उन्हें धर्म की गहरी समझ, फ़िक्ह और उन चीज़ों का ज्ञान दिया गया जो उनके जीवन के लिए आवश्यक थीं। यह सिर्फ़ सांसारिक ज्ञान नहीं था, बल्कि वह ज्ञान था जो उन्हें सही रास्ते पर चलने और दूसरों को सही रास्ता दिखाने में मदद करता था।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और इसी तरह हम नेकी करने वालों को बदला देते हैं।" यानी जिस तरह हमने यूसुफ़ को उनके अच्छे कर्मों और अल्लाह की इबादत में सच्चाई की वजह से यह सम्मान और ज्ञान दिया, उसी तरह हम अपने उन सभी बंदों को भी नवाज़ते हैं जो अच्छाई करते हैं। यह एक सामान्य नियम है — जो लोग अल्लाह की आज्ञा का पालन करते हैं और अपने कार्यों में भलाई अपनाते हैं, अल्लाह उन्हें समझ, ज्ञान और सफलता प्रदान करता है।

इस आयत में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के लिए भी तसल्ली है कि जिस तरह यूसुफ़ को उनकी मुश्किलों के बाद सम्मान मिला, उसी तरह आपको भी अपने धैर्य और अच्छाई के बदले में अल्लाह की ओर से मदद और कामयाबी मिलेगी।


फ़ायदे (सीख):

  1. अच्छाई का बदला अल्लाह देता है: यह आयत हमें सिखाती है कि अच्छे कर्मों का फल अल्लाह के पास सुरक्षित है। जो लोग नेकी करते हैं, चाहे उन्हें दुनिया में पहचान न मिले, अल्लाह उन्हें ज़रूर नवाज़ता है — कभी ज्ञान से, कभी सम्मान से, कभी सफलता से।
  2. युवावस्था में ज्ञान की अहमियत: हज़रत यूसुफ़ को जवानी में ही हुक्म और इल्म दिया गया। इससे पता चलता है कि युवावस्था सीखने और समझने का सबसे अच्छा समय है। हमें चाहिए कि अपनी जवानी को अल्लाह की इबादत और ज्ञान हासिल करने में लगाएँ।
  3. इबादत में अच्छाई (इहसान): "मुहसिन" वह है जो अपने काम को बेहतरीन तरीके से करे। हमें अपनी नमाज़, रोज़ा और हर अच्छे काम को पूरे दिल से और अच्छी तरह से करना चाहिए, न कि सिर्फ़ रस्म अदा करने के लिए।
  4. मुश्किलों के बाद आसानी: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने कई कठिनाइयाँ झेलीं — कुँए में डाला जाना, ग़ुलामी, जेल — लेकिन अल्लाह ने उन्हें उन सबके बाद बड़ा सम्मान दिया। यह हमें सिखाता है कि धैर्य और अच्छाई पर डटे रहने से अल्लाह की मदद ज़रूर आती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 20-24 — यूसुफ

20وَشَرَوْهُ بِثَمَنٍ بَخْسٍ دَرَاهِمَ مَعْدُودَةٍ وَكَانُوا فِيهِ مِنَ الزَّاهِدِينَ
(जब यूसुफ के भाइयों को ख़बर लगी तो आ पहुँचे और उनको अपना ग़ुलाम बताया और उन लोगों ने यूसुफ को गिनती के खोटे चन्द दरहम (बहुत थोड़े दाम पर बेच डाला) और वह लोग तो यूसुफ से बेज़ार हो ही रहे थे
21وَقَالَ الَّذِي اشْتَرَاهُ مِن مِّصْرَ لِامْرَأَتِهِ أَكْرِمِي مَثْوَاهُ عَسَىٰ أَن يَنفَعَنَا أَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًا ۚ وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْأَرْضِ وَلِنُعَلِّمَهُ مِن تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ ۚ وَاللَّهُ غَالِبٌ عَلَىٰ أَمْرِهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
(यूसुफ को लेकर मिस्र पहुँचे और वहाँ उसे बड़े नफे में बेच डाला) और मिस्र के लोगों से (अज़ीजे मिस्र) जिसने (उनको ख़रीदा था अपनी बीवी (ज़ुलेख़ा) से कहने लगा इसको इज्ज़त व आबरु से रखो अजब नहीं ये हमें कुछ नफा पहुँचाए या (शायद) इसको अपना बेटा ही बना लें और यू हमने यूसुफ को मुल्क (मिस्र) में (जगह देकर) क़ाबिज़ बनाया और ग़रज़ ये थी कि हमने उसे ख्वाब की बातों की ताबीर सिखायी और ख़ुदा तो अपने काम पर (हर तरह के) ग़ालिब व क़ादिर है मगर बहुतेरे लोग (उसको) नहीं जानते
22وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
और जब यूसुफ अपनी जवानी को पहुँचे तो हमने उनको हुक्म (नुबूवत) और इल्म अता किया और नेकी कारों को हम यूँ ही बदला दिया करते हैं
23وَرَاوَدَتْهُ الَّتِي هُوَ فِي بَيْتِهَا عَن نَّفْسِهِ وَغَلَّقَتِ الْأَبْوَابَ وَقَالَتْ هَيْتَ لَكَ ۚ قَالَ مَعَاذَ اللَّهِ ۖ إِنَّهُ رَبِّي أَحْسَنَ مَثْوَايَ ۖ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ
और जिस औरत ज़ुलेखा के घर में यूसुफ रहते थे उसने अपने (नाजायज़) मतलब हासिल करने के लिए ख़ुद उनसे आरज़ू की और सब दरवाज़े बन्द कर दिए और (बे ताना) कहने लगी लो आओ यूसुफ ने कहा माज़अल्लाह वह (तुम्हारे मियाँ) मेरा मालिक हैं उन्होंने मुझे अच्छी तरह रखा है मै ऐसा ज़ुल्म क्यों कर सकता हूँ बेशक ऐसा ज़ुल्म करने वाले फलाह नहीं पाते
24وَلَقَدْ هَمَّتْ بِهِ ۖ وَهَمَّ بِهَا لَوْلَا أَن رَّأَىٰ بُرْهَانَ رَبِّهِ ۚ كَذَٰلِكَ لِنَصْرِفَ عَنْهُ السُّوءَ وَالْفَحْشَاءَ ۚ إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُخْلَصِينَ
ज़ुलेखा ने तो उनके साथ (बुरा) इरादा कर ही लिया था और अगर ये भी अपने परवरदिगार की दलीन न देख चुके होते तो क़स्द कर बैठते (हमने उसको यूँ बचाया) ताकि हम उससे बुराई और बदकारी को दूर रखे बेशक वह हमारे ख़ालिस बन्दों में से था
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अनुवाद — यूसुफ 22

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Tuesday, August 18, 2026

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