Allaahu yabsutur rizqa limai yashaaa`u wa yaqdir; wa farihoo bilhayaatid dunyaa wa mal hayaatud dunya fil Aakhirati illaa mataa
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और ख़ुदा ही जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है तंग करता है और ये लोग दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी पर बहुत निहाल हैं हालॉकि दुनियावी ज़िन्दगी (नईम) आख़िरत के मुक़ाबिल में बिल्कुल बेहकीक़त चीज़ है
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خدا جس کا چاہتا ہے رزق فراخ کر دیتا ہے اور (جس کا چاہتا ہے) تنگ کر دیتا ہے۔ اور کافر لوگ دنیا کی زندگی پر خوش ہو رہے ہیں اور دنیا کی زندگی آخرت (کے مقابلے) میں (بہت) تھوڑا فائدہ ہے
और ख़ुदा ही जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है तंग करता है और ये लोग दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी पर बहुत निहाल हैं हालॉकि दुनियावी ज़िन्दगी (नईम) आख़िरत के मुक़ाबिल में बिल्कुल बेहकीक़त चीज़ है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
يَبْسُطُ: फैलाना, विस्तार करना, अर्थात रोज़ी में कुशादगी देना।
وَيَقْدِرُ: तंग करना, कम करना, अर्थात रोज़ी में तंगी करना।
فَرِحُوا: वे खुश हुए, प्रसन्न हुए।
مَتَاعٌ: थोड़ा सा सामान या लाभ जो अस्थायी हो।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह ही है जो अपने बंदों में से जिसे चाहता है रोज़ी में कुशादगी (विस्तार) देता है, और जिसे चाहता है तंगी देता है। यह उसकी मर्ज़ी और हिकमत पर निर्भर है, न कि इस बात पर कि बंदा उसका प्यारा है या नहीं। किसी को अधिक धन देना उसकी इज़्ज़त की निशानी नहीं, और किसी को कम देना उसकी बेइज़्ज़ती की निशानी नहीं। कभी अल्लाह काफ़िर को धन देता है ताकि उसे उसी में मुब्तला करके आज़माए, और कभी मोमिन को तंगी देता है ताकि उसका अज्र (पुण्य) बढ़े।
फिर अल्लाह तआला काफ़िरों की नादानी का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि वे दुनिया की इस कुशादगी और सुख-सुविधाओं पर इतरा कर खुश हो जाते हैं, और इसी पर इत्मिनान कर लेते हैं। लेकिन यह खुशी नाशुक्री वाली है, शुक्र वाली नहीं। और यह दुनिया की ज़िंदगी आख़िरत के मुक़ाबले में महज़ एक थोड़ा सा अस्थायी सामान है, जो जल्द ही ख़त्म हो जाने वाला है। आख़िरत की नेअमतों के सामने यह दुनिया कुछ भी नहीं, बस एक क्षणभंगुर लाभ है जो फ़ना हो जाता है।
फ़ायदे (सबक):
रोज़ी की कुशादगी और तंगी अल्लाह के हाथ में है, और उसकी हिकमत पर आधारित है। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह धन की अधिकता पर घमंड न करे और कमी पर निराश न हो।
दुनिया की खुशियाँ और सुख-सुविधाएँ अस्थायी हैं, इन पर भरोसा करना और इन्हीं में मग्न रहना मूर्खता है। असली कामयाबी आख़िरत की कामयाबी है।
यह आयत हमें सिखाती है कि हमें दुनिया को आख़िरत का खेत समझना चाहिए, और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत और नेक कामों में गुज़ारना चाहिए, ताकि आख़िरत में हमेशा रहने वाली नेअमतें हासिल कर सकें।
काफ़िरों की तरह दुनिया पर इतराना और उसे ही सब कुछ समझ लेना बड़ी भूल है; बल्कि हमें हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसकी रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए।
और जो लोग ख़ुदा से एहद व पैमान को पक्का करने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन (तालुकात बाहमी) के क़ायम रखने का ख़ुदा ने हुक्म दिया है उन्हें क़तआ (तोड़ते) करते हैं और रुए ज़मीन पर फ़साद फैलाते फिरते हैं ऐसे ही लोग हैं जिनके लिए लानत है और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा घर (जहन्नुम) है
और ख़ुदा ही जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है तंग करता है और ये लोग दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी पर बहुत निहाल हैं हालॉकि दुनियावी ज़िन्दगी (नईम) आख़िरत के मुक़ाबिल में बिल्कुल बेहकीक़त चीज़ है
और जिन लोगों ने कुफ्र एख़तियार किया वह कहते हैं कि उस (शख्स यानि तुम) पर हमारी ख्वाहिश के मुवाफिक़ कोई मौजिज़ा उसके परवरदिगार की तरफ से क्यों नहीं नाज़िल होता तुम उनसे कह दो कि इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है
और जिसने उसकी तरफ रुज़ू की उसे अपनी तरफ पहुँचने की राह दिखाता है (ये) वह लोग हैं जिन्होंने ईमान कुबूल किया और उनके दिलों को ख़ुदा की चाह से तसल्ली हुआ करती है
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