अल-हिज्र · 48/99
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हिज्र
لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌ وَمَا هُم مِّنْهَا بِمُخْرَجِينَ ۝٤٨
Laa yamas suhum feehaa nasabunw wa maa hum minhaa bimukhrajeen
📖 हिंदी अर्थ
उनको बेहश्त में तकलीफ छुएगी भी तो नहीं और न कभी उसमें से निकाले जाएँगें

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • नَصَبٌ: थकान, परिश्रम, कष्ट या मेहनत।
  • بِمُخْرَجِينَ: निकाले जाने वाले।

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला ने अपने डरने वाले और नेक बंदों की उस नेमत का वर्णन किया है जो उन्हें जन्नत में मिलेगी। जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करते हैं और उसकी मनाही से बचते हैं, उनसे कहा जाएगा कि इस जन्नत में सलामती और अमन के साथ दाखिल हो जाओ। वहाँ उन्हें कोई थकान, कष्ट या परेशानी नहीं पहुँचेगी। न उनके शरीर को कोई मेहनत होगी और न उनके दिल को कोई ग़म। साथ ही, उन्हें वहाँ से कभी निकाला नहीं जाएगा, बल्कि वे हमेशा के लिए उसमें रहेंगे। यह उनके लिए पूरी नेमत है कि न तो वहाँ कोई दुख है और न ही निकलने का डर। उनका जीवन सुख, आराम और हमेशा रहने वाला होगा, जिसमें कोई कमी या अंत नहीं।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से पता चलता है कि जन्नत की नेमतें किसी भी प्रकार के कष्ट से पाक हैं। वहाँ न थकान होगी, न बीमारी, न ग़म और न ही कोई परेशानी। यह अल्लाह की ओर से उसके नेक बंदों के लिए एक बड़ा इनाम है।
  2. जन्नत में हमेशा रहना और वहाँ से कभी न निकाला जाना, मोमिन के लिए सबसे बड़ी खुशी की बात है। यह अल्लाह की रहमत और उसके वादे की सच्चाई को दर्शाता है कि वह अपने बंदों को कभी निराश नहीं करता।
  3. यह आयत मुसलमानों को अल्लाह की इबादत और उसकी आज्ञा का पालन करने की प्रेरणा देती है, क्योंकि इसका नतीजा ऐसी जगह है जहाँ कोई दुख नहीं और जहाँ से कभी निकलना नहीं पड़ेगा।
  4. इससे यह भी समझ आता है कि दुनिया की मेहनत और कष्ट अस्थायी हैं, जबकि आख़िरत का सुख और आराम हमेशा रहने वाला है। इसलिए बुद्धिमान वही है जो इस अस्थायी जीवन में अल्लाह की रज़ा के लिए काम करे।


📜 आयत 46-50 — सूरा अल-हिज्र

46ادْخُلُوهَا بِسَلَامٍ آمِنِينَ
(दाख़िले के वक्त फ़रिश्ते कहेगें कि) उनमें सलामती इत्मिनान से चले चलो
47وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِم مِّنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَىٰ سُرُرٍ مُّتَقَابِلِينَ
और (दुनिया की तकलीफों से) जो कुछ उनके दिल में रंज था उसको भी हम निकाल देगें और ये बाहम एक दूसरे के आमने सामने तख्तों पर इस तरह बैठे होगें जैसे भाई भाई
48لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌ وَمَا هُم مِّنْهَا بِمُخْرَجِينَ
उनको बेहश्त में तकलीफ छुएगी भी तो नहीं और न कभी उसमें से निकाले जाएँगें
49۞ نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
(ऐ रसूल) मेरे बन्दों को आगाह करो कि बेशक मै बड़ा बख्शने वाला मेहरबान हूँ
50وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ
मगर साथ ही इसके (ये भी याद रहे कि) बेशक मेरा अज़ाब भी बड़ा दर्दनाक अज़ाब है
अल-हिज्रकुरान सूची
99आयत
मक्कीअवतरण स्थान
48आयत

अनुवाद — अल-हिज्र 48

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Thursday, October 1, 2026

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