अल-हिज्र · 80/99
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हिज्र
وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَابُ الْحِجْرِ الْمُرْسَلِينَ ۝٨٠
Wa laqad kazzaba ashaabul Hijril mursaleen
📖 हिंदी अर्थ
और इसी तरह हिज्र के रहने वालों (क़ौम सालेह ने भी) पैग़म्बरों को झुठलाया

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अस्हाबुल हिज्र: "हिज्र" एक वादी (घाटी) का नाम है जो हिजाज़ और शाम (सीरिया) के बीच स्थित है। यह समुद (समूद) क़ौम का निवास स्थान था। "अस्हाब" का अर्थ है निवासी या साथी।
  • अल-मुरसलीन: भेजे गए पैग़म्बर (अलैहिमुस्सलाम)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि "हिज्र" (पत्थरों की घाटी) के निवासियों ने — जो क़ौमे समूद थी — रसूलों को झुठलाया। उन्होंने अपने नबी हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) को झुठलाया, और चूँकि सभी पैग़म्बरों का दीन एक ही है और वे एक ही सत्य की ओर बुलाते हैं, इसलिए एक नबी को झुठलाना गोया सभी रसूलों को झुठलाना है। यह क़ौम अपनी ताक़त और पहाड़ों को काटकर घर बनाने की कला में मशहूर थी, लेकिन उनके इस घमंड और सच्चाई से मुँह मोड़ने के कारण उन पर अल्लाह का अज़ाब आया। उन्होंने हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) के मुँहज़े (चमत्कार) — ऊँटनी — को भी झुठलाया और उसे मार डाला, जिसके बाद उन्हें सज़ा दी गई।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सभी पैग़म्बरों का पैग़ाम एक ही है — अल्लाह की इबादत और उसकी वहदानिय्यत (एकता) — इसलिए किसी भी नबी को न मानना या उसका विरोध करना पूरे दीन का विरोध है।
  2. यहाँ से हमें यह सबक मिलता है कि दुनियावी ताक़त, बड़ी इमारतें और तरक़्क़ी अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकतीं। क़ौमे समूद अपनी मज़बूत चट्टानों को काटकर घर बनाती थी, लेकिन जब अल्लाह का फ़ैसला आया तो कोई चीज़ उनके काम न आई।
  3. यह आयत हमें नबियों की तकज़ीब (झुठलाने) के अंजाम से डराती है और सच्चाई को क़बूल करने की तरग़ीब देती है। जो लोग सच्चाई को सुनकर भी घमंड से उसे ठुकरा देते हैं, उनका अंजाम बहुत बुरा होता है।
  4. इससे हमें यह भी पता चलता है कि अल्लाह के रसूलों की दावत हमेशा एक जैसी रही है — तौहीद, आख़िरत पर ईमान और अच्छे आचरण की शिक्षा — और यही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देता है।


📜 आयत 78-82 — सूरा अल-हिज्र

78وَإِن كَانَ أَصْحَابُ الْأَيْكَةِ لَظَالِمِينَ
और एैका के रहने वाले (क़ौमे शुएब की तरह बड़े सरकश थे)
79فَانتَقَمْنَا مِنْهُمْ وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُّبِينٍ
तो उन से भी हमने (नाफरमानी का) बदला लिया और ये दो बस्तियाँ (क़ौमे लूत व शुएब की) एक खुली हुई यह राह पर (अभी तक मौजूद) हैं
80وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَابُ الْحِجْرِ الْمُرْسَلِينَ
और इसी तरह हिज्र के रहने वालों (क़ौम सालेह ने भी) पैग़म्बरों को झुठलाया
81وَآتَيْنَاهُمْ آيَاتِنَا فَكَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ
और (बावजूद कि) हमने उन्हें अपनी निशानियाँ दी उस पर भी वह लोग उनसे रद गिरदानी करते रहे
82وَكَانُوا يَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا آمِنِينَ
और बहुत दिल जोई से पहाड़ों को तराश कर घर बनाते रहे
अल-हिज्रकुरान सूची
99आयत
मक्कीअवतरण स्थान
80आयत

अनुवाद — अल-हिज्र 80

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Thursday, October 1, 2026

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