अल-कहफ · 97/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
فَمَا اسْطَاعُوا أَن يَظْهَرُوهُ وَمَا اسْتَطَاعُوا لَهُ نَقْبًا ۝٩٧
Famas taa`ooo any yazharoohu wa mastataa`oo lahoo naqbaa
📖 हिंदी अर्थ
तो कहा कि अब हमको ताँबा दो कि इसको पिघलाकर इस दीवार पर उँडेल दें (ग़रज़) वह ऐसी ऊँची मज़बूत दीवार बनी कि न तो याजूज व माजूज उस पर चढ़ ही सकते थे और न उसमें नक़ब लगा सकते थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اسْطَاعُوا / اسْتَطَاعُوا: वे सामर्थ्य नहीं रखते थे, शक्ति नहीं पा सकते थे।
  • يَظْهَرُوهُ: उस (दीवार) के ऊपर चढ़ना, उस पर चढ़कर पार जाना।
  • نَقْبًا: छेद करना, सुराख़ बनाना, तोड़ना।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब ज़ुल-क़रनैन ने लोहे और ताँबे का यह अटूट सरहद (दीवार) तैयार कर दी, तो याजूज और माजूज की जंगली और उग्र क़ौमें उस पर चढ़ने या उसे तोड़ने की हर कोशिश में नाकाम रहीं। वे न तो उसके ऊपर चढ़ सके, क्योंकि वह बहुत ऊँची, چکनी और फिसलन भरी थी—उस पर पैर जमाना नामुमकिन था। और न ही वे उसके नीचे से सुराख़ कर सके, क्योंकि वह इतनी मोटी, मज़बूत और सख़्त थी कि उसमें कोई दरार नहीं आ सकती थी। यह अल्लाह की क़ुदरत का नमूना था कि एक इंसान ने उसके हुक्म से ऐसी रुकावट खड़ी कर दी जो उन ताकतवर और बड़ी क़ौमों के लिए नाकाबिल-ए-गुज़ार बन गई।

यहाँ से हमें सीख मिलती है कि जब इंसान अल्लाह पर भरोसा करके, उसकी दी हुई ताक़त और ज़रिया इस्तेमाल करता है, तो अल्लाह उसे ऐसी कामयाबी देता है जो दुनिया की बड़ी से बड़ी ताक़तों के लिए भी नामुमकिन होती है। यह सिर्फ़ एक दीवार की कहानी नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए निशानी है जो अल्लाह की राह में क़दम उठाता है—अल्लाह उसके लिए ऐसे रास्ते खोलता है और ऐसी हिफ़ाज़त करता है जिसका उसे गुमान भी नहीं होता।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की तरफ़ से आने वाली हर चीज़—चाहे वह दुनिया की ताक़त हो या दीन की हिफ़ाज़त—अपने वक़्त पर आती है और उसके हुक्म के बग़ैर कोई उसे बदल नहीं सकता। जब वादा पूरा होगा, तो यही दीवार ढह जाएगी, क्योंकि अल्लाह का वादा सच्चा है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करें, उसकी क़ुदरत पर यक़ीन रखें और उसकी इबादत में मशग़ूल रहें—क्योंकि वही सबसे बड़ा हिफ़ाज़त करने वाला और ताक़त देने वाला है।



📜 आयत 95-99 — अल-कहफ

95قَالَ مَا مَكَّنِّي فِيهِ رَبِّي خَيْرٌ فَأَعِينُونِي بِقُوَّةٍ أَجْعَلْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ رَدْمًا
जुलकरनैन ने कहा कि मेरे परवरदिगार ने ख़र्च की जो कुदरत मुझे दे रखी है वह (तुम्हारे चन्दे से) कहीं बेहतर है (माल की ज़रूरत नहीं) तुम फक़त मुझे क़ूवत से मदद दो तो मैं तुम्हारे और उनके दरमियान एक रोक बना दूँ
96آتُونِي زُبَرَ الْحَدِيدِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا سَاوَىٰ بَيْنَ الصَّدَفَيْنِ قَالَ انفُخُوا ۖ حَتَّىٰ إِذَا جَعَلَهُ نَارًا قَالَ آتُونِي أُفْرِغْ عَلَيْهِ قِطْرًا
(अच्छा तो) मुझे (कहीं से) लोहे की सिले ला दो (चुनान्चे वह लोग) लाए और एक बड़ी दीवार बनाई यहाँ तक कि जब दोनो कंगूरो के दरमेयान (दीवार) को बुलन्द करके उनको बराबर कर दिया तो उनको हुक्म दिया कि इसके गिर्द आग लगाकर धौको यहां तक उसको (धौंकते-धौंकते) लाल अंगारा बना दिया
97فَمَا اسْطَاعُوا أَن يَظْهَرُوهُ وَمَا اسْتَطَاعُوا لَهُ نَقْبًا
तो कहा कि अब हमको ताँबा दो कि इसको पिघलाकर इस दीवार पर उँडेल दें (ग़रज़) वह ऐसी ऊँची मज़बूत दीवार बनी कि न तो याजूज व माजूज उस पर चढ़ ही सकते थे और न उसमें नक़ब लगा सकते थे
98قَالَ هَٰذَا رَحْمَةٌ مِّن رَّبِّي ۖ فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ رَبِّي جَعَلَهُ دَكَّاءَ ۖ وَكَانَ وَعْدُ رَبِّي حَقًّا
जुलक़रनैन ने (दीवार को देखकर) कहा ये मेरे परवरदिगार की मेहरबानी है मगर जब मेरे परवरदिगार का वायदा (क़यामत) आयेगा तो इसे ढहा कर हमवार कर देगा और मेरे परवरदिगार का वायदा सच्चा है
99۞ وَتَرَكْنَا بَعْضَهُمْ يَوْمَئِذٍ يَمُوجُ فِي بَعْضٍ ۖ وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَجَمَعْنَاهُمْ جَمْعًا
और हम उस दिन (उन्हें उनकी हालत पर) छोड़ देंगे कि एक दूसरे में (टकरा के दरिया की) लहरों की तरह गुड़मुड़ हो जाएँ और सूर फूँका जाएगा तो हम सब को इकट्ठा करेंगे
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अनुवाद — अल-कहफ 97

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Tuesday, August 18, 2026

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