अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- حِسَابُهُمْ – उनका हिसाब (लेखा-जोखा)
- إِلَّا عَلَىٰ رَبِّي – मेरे रब ही के ज़िम्मे है
- لَوْ تَشْعُرُونَ – काश! तुम जानते / समझते
तफ़सीर:
यह आयत हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) के उस दौर से जुड़ी है, जब उनकी क़ौम के सरदारों ने उन पर यह इल्ज़ाम लगाया कि आप अपने साथ नीच और ग़रीब लोगों को शामिल कर लेते हैं। इस पर अल्लाह के नबी ने जो जवाब दिया, उसका एक हिस्सा इस आयत में बयान हुआ है।
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) फ़रमा रहे हैं कि इन लोगों का हिसाब-किताब, उनके अंदरूनी हालात की जाँच और उनके आमाल का जज़ा (बदला) मेरे रब के सिवा किसी और के ज़िम्मे नहीं है। मेरा काम सिर्फ़ अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना है, न कि उनके दिलों के राज़ जानना या उनके अंजाम का फ़ैसला करना। अल्लाह ही है जो हर इंसान के सीने के भेद, उसकी नीयत और उसके अंदर की हर बात को जानता है। वही उनके ईमान या निफ़ाक़ का सही इल्म रखता है और वही उनके साथ इंसाफ़ करेगा।
फिर आपने फ़रमाया: "लौ तश्उरून" यानी काश! तुम लोग इस हक़ीक़त को महसूस करते और समझते कि हिसाब का मामला अल्लाह के सुपुर्द है, तो तुम कभी यह बात न कहते कि हमें तुम्हारे साथियों से कोई वास्ता नहीं। तुम्हारी यह बेजा राय और यह बेबुनियाद एतराज़ दरअसल तुम्हारी नासमझी और अंधी दिली की वजह से है। अगर तुम्हारे दिलों में ज़रा भी शऊर (समझ) होती, तो तुम जान जाते कि अल्लाह के नबी का काम सिर्फ़ दावत है, और फ़ैसला अल्लाह ही के हाथ में है।
इस आयत में हमारे लिए एक बहुत बड़ी सीख है — हमें किसी इंसान के बारे में उसके ज़ाहिरी हालात की बिना पर फ़ैसला नहीं करना चाहिए। किसी को छोटा या बड़ा, कमज़ोर या ताक़तवर समझकर उसे दीन से दूर नहीं करना चाहिए। असल कसौटी अल्लाह के पास है, और वही हर इंसान के दिल का हाल जानता है। जो लोग दुनिया में कमज़ोर और ग़रीब नज़र आते हैं, वे अल्लाह के यहाँ बहुत प्यारे और बड़े हो सकते हैं, अगर उनका दिल ईमान से भरा हो।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने काम पर ध्यान देना चाहिए और दूसरों के हिसाब के मामले को अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए। हमारा फ़र्ज़ है कि हम अच्छी बात पहुँचाएँ, नेकी की तरफ़ बुलाएँ, और बुराई से रोकें — लेकिन लोगों के दिलों का फ़ैसला और उनके अंजाम का मामला अल्लाह ही के हाथ में है। यही वह हक़ीक़त है जो एक मोमिन को हर हाल में सब्र और भरोसे पर क़ायम रखती है, और उसे किसी इंसान की राय या इल्ज़ाम से विचलित नहीं होने देती।
📜 आयत 111-115 — अश-शुआरा
अनुवाद — अश-शुआरा 113
सूरा अश-शुआरा आयत 113 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : इन लोगों का हिसाब तो मेरे परवरदिगार के ज़िम्मे हैसूरा आयत 113/227 — अश-शुआरा الشعراء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अश-शुआरा सुनें, अश-शुआरा अनुवाद, अश-शुआरा mp3, अश-शुआरा pdf. आयत 111–115. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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