आल-इमरान · 83/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
أَفَغَيْرَ دِينِ اللَّهِ يَبْغُونَ وَلَهُ أَسْلَمَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ ۝٨٣
Afaghaira deenil laahi yabghoona wa lahooo aslama man fis samaawaati wal ardi taw`anw wa karhanw wa ilaihi yurja`oon
📖 हिंदी अर्थ
तो क्या ये लोग ख़ुदा के दीन के सिवा (कोई और दीन) ढूंढते हैं हालॉकि जो (फ़रिश्ते) आसमानों में हैं और जो (लोग) ज़मीन में हैं सबने ख़ुशी ख़ुशी या ज़बरदस्ती उसके सामने अपनी गर्दन डाल दी है और (आख़िर सब) उसकी तरफ़ लौट कर जाएंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَبْغُونَ: चाहते हैं, खोजते हैं।
  • أَسْلَمَ: आज्ञाकारी हुआ, समर्पित हुआ।
  • طَوْعًا: स्वेच्छा से, अपनी इच्छा से।
  • कَرْهًا: विवश होकर, अनिच्छा से।

तफ़सीर (व्याख्या):

क्या ये लोग, जो अहले-किताब में से हैं और सत्य से भटक गए हैं, अल्लाह के दीन (इस्लाम) के अलावा किसी और दीन की तलाश कर रहे हैं? जबकि अल्लाह ही वह है जिसने इस्लाम को अपने बंदों के लिए चुना है। यह वही दीन है जिसे अल्लाह ने अपने आख़िरी नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा।

सच्चाई यह है कि आसमानों और ज़मीन में जो भी है—चाहे वह फ़रिश्ते हों, इंसान हों, जिन्नात हों या अन्य सृष्टियाँ—सभी अल्लाह के सामने समर्पित और आज्ञाकारी हैं। मोमिन लोग अपनी इच्छा और खुशी से उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, जबकि काफ़िर और मुनाफ़िक़ लोग विवश होकर उसके अधीन हैं। क्योंकि वे अल्लाह की कुदरत और उसके क़ानून से बच नहीं सकते। जब उन पर मुसीबतें आती हैं या वे विपत्ति में घिरते हैं, तो वे भी लाचार होकर अल्लाह ही की ओर रुजू करते हैं। पूरी कायनात उसी के हुक्म के ताबे है, और अंत में सबको उसी की ओर लौटना है। क़यामत के दिन वह हर एक को उसके कर्मों का बदला देगा।

यह आयत अल्लाह की ओर से एक सख़्त चेतावनी है कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम के अलावा किसी और धर्म पर अल्लाह के सामने पेश न हो, क्योंकि अल्लाह ने अपने बंदों के लिए केवल इस्लाम को ही पसंद किया है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि इस्लाम ही अल्लाह का सच्चा दीन है, और अल्लाह के यहाँ कोई और दीन क़ुबूल नहीं। इसलिए हमें अपने दीन पर दृढ़ रहना चाहिए और उस पर गर्व करना चाहिए।
  2. पूरी कायनात अल्लाह के आगे समर्पित है, तो हम इंसानों को भी अपने रब की आज्ञा का पालन स्वेच्छा से करना चाहिए, न कि विवश होकर। यही हमारी सफलता का रास्ता है।
  3. यह आयत हमें याद दिलाती है कि हर हाल में हमें अल्लाह की ओर लौटना है, इसलिए अपनी ज़िंदगी को उसी के बताए हुए तरीके पर चलाना चाहिए, ताकि उस दिन हम कामयाब हों।
  4. इस्लाम एक ऐसा दीन है जो फ़ितरत (प्राकृतिक स्वभाव) के अनुरूप है, इसलिए इसे अपनाना आसान है और यही सच्ची राह है।


📜 आयत 81-85 — सूरा आल-इमरान

81وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آتَيْتُكُم مِّن كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُّصَدِّقٌ لِّمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنصُرُنَّهُ ۚ قَالَ أَأَقْرَرْتُمْ وَأَخَذْتُمْ عَلَىٰ ذَٰلِكُمْ إِصْرِي ۖ قَالُوا أَقْرَرْنَا ۚ قَالَ فَاشْهَدُوا وَأَنَا مَعَكُم مِّنَ الشَّاهِدِينَ
(और ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब ख़ुदा ने पैग़म्बरों से इक़रार लिया कि हम तुमको जो कुछ किताब और हिकमत (वगैरह) दे उसके बाद तुम्हारे पास कोई रसूल आए और जो किताब तुम्हारे पास उसकी तसदीक़ करे तो (देखो) तुम ज़रूर उस पर ईमान लाना, और ज़रूर उसकी मदद करना (और) ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुमने इक़रार लिया तुमने मेरे (एहद का) बोझ उठा लिया सबने अर्ज़ की हमने इक़रार किया इरशाद हुआ (अच्छा) तो आज के क़ौल व (क़रार के) आपस में एक दूसरे के गवाह रहना
82فَمَن تَوَلَّىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
और तुम्हारे साथ मैं भी एक गवाह हूं फिर उसके बाद जो शख्स (अपने क़ौल से) मुंह फेरे तो वही लोग बदचलन हैं
83أَفَغَيْرَ دِينِ اللَّهِ يَبْغُونَ وَلَهُ أَسْلَمَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ
तो क्या ये लोग ख़ुदा के दीन के सिवा (कोई और दीन) ढूंढते हैं हालॉकि जो (फ़रिश्ते) आसमानों में हैं और जो (लोग) ज़मीन में हैं सबने ख़ुशी ख़ुशी या ज़बरदस्ती उसके सामने अपनी गर्दन डाल दी है और (आख़िर सब) उसकी तरफ़ लौट कर जाएंगे
84قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ عَلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَالنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ
(ऐ रसूल उन लोगों से) कह दो कि हम तो ख़ुदा पर ईमान लाए और जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो (सहीफ़े) इबराहीम और इस्माईल और इसहाक़ और याकूब और औलादे याकूब पर नाज़िल हुये और मूसा और ईसा और दूसरे पैग़म्बरों को जो (जो किताब) उनके परवरदिगार की तरफ़ से इनायत हुई(सब पर ईमान लाए) हम तो उनमें से किसी एक में भी फ़र्क़ नहीं करते
85وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ
और हम तो उसी (यकता ख़ुदा) के फ़रमाबरदार हैं और जो शख्स इस्लाम के सिवा किसी और दीन की ख्वाहिश करे तो उसका वह दीन हरगिज़ कुबूल ही न किया जाएगा और वह आख़िरत में सख्त घाटे में रहेगा
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीअवतरण स्थान
83आयत

अनुवाद — आल-इमरान 83

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Monday, September 28, 2026

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