लुकमान · 7/34
अनुवाद उच्चारण — लुकमान
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا وَلَّىٰ مُسْتَكْبِرًا كَأَن لَّمْ يَسْمَعْهَا كَأَنَّ فِي أُذُنَيْهِ وَقْرًا ۖ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ ۝٧
Wa izaa tutlaa `alayhi Aayaatunaa wallaa mustakbiran ka al lam yasma`haa ka anna feee uzunwihi waqran fabash shiru bi`azaabin aleem
📖 हिंदी अर्थ
और जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो शेख़ी के मारे मुँह फेरकर (इस तरह) चल देता है गोया उसने इन आयतों को सुना ही नहीं जैसे उसके दोनो कानों में ठेठी है तो (ऐ रसूल) तुम उसको दर्दनाक अज़ाब की (अभी से) खुशख़बरी दे दे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَلَّىٰ – मुँह फेर लिया, पीठ दिखा दी
  • مُسْتَكْبِرًا – घमंड और अहंकार के साथ
  • وَقْرًا – कानों में भारीपन या बहरापन (जिससे सुनने की शक्ति ख़त्म हो जाए)
  • فَبَشِّرْهُ – उसे ख़ुशख़बरी सुना दो (यहाँ व्यंग्य के तौर पर)
  • عَذَابٍ أَلِيمٍ – दर्दनाक और तकलीफ़देह अज़ाब

तफ़सीर:

जब ऐसे लोगों के सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं—जिनमें तौहीद का पैग़ाम, आख़िरत की याद दिलाना और नेकी की तरफ़ बुलाना होता है—तो वे उन्हें सुनने से इनकार कर देते हैं। वे घमंड और अहंकार के साथ मुँह फेर लेते हैं, जैसे उन्होंने सुना ही नहीं। उनका ये अंदाज़ ऐसा होता है मानो उनके कानों में बहरापन हो और वे सुन ही नहीं पा रहे हों। वे न तो आयतों पर ग़ौर करते हैं, न उनसे कोई सबक़ लेते हैं, बल्कि अहंकार की वजह से सच्चाई को क़बूल करने से कतराते हैं।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि ऐ नबी! ऐसे लोगों को उस दर्दनाक अज़ाब की "ख़ुशख़बरी" सुना दो—यानी उन्हें बता दो कि उनके इस रवैये का अंजाम जहन्नुम का भयंकर अज़ाब है। यहाँ "बशारत" (ख़ुशख़बरी) का लफ़्ज़ व्यंग्य के तौर पर इस्तेमाल हुआ है, क्योंकि असल में ये कोई ख़ुशख़बरी नहीं बल्कि सख़्त से सख़्त सज़ा की चेतावनी है।

ये आयत हमें बताती है कि क़ुरआन की आयतों से मुँह मोड़ना और उन्हें सुनने से इनकार करना कितना बड़ा गुनाह है। इंसान चाहे जितना भी इल्म हासिल कर ले, अगर वो अहंकार की वजह से हक़ को क़बूल नहीं करता, तो उसका इल्म उसे किसी काम नहीं आएगा। अल्लाह का कलाम ऐसी नेमत है जो दिलों को ज़िंदगी देता है, और जो इसे सुनकर भी अनसुना कर दे, वो अपने ही नुक़्सान का सामान करता है।

प्यारे भाइयों और बहनों! हमें चाहिए कि जब भी क़ुरआन की आयतें सुनें, तो पूरे तवज्जो से सुनें, उस पर ग़ौर करें और उस पर अमल करें। क़ुरआन हमारे लिए रहनुमा है, हमारी ज़िंदगी की हर मुश्किल का हल उसी में मौजूद है। जो लोग उससे मुँह मोड़ते हैं, वे दुनिया में भी भटके रहते हैं और आख़िरत में भी उनका अंजाम बुरा होगा। अल्लाह हम सबको क़ुरआन को सुनने, समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 5-9 — लुकमान

5أُولَٰئِكَ عَلَىٰ هُدًى مِّن رَّبِّهِمْ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
यही लोग अपने परवरदिगार की हिदायत पर आमिल हैं और यही लोग (क़यामत में) अपनी दिली मुरादें पाएँगे
6وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْتَرِي لَهْوَ الْحَدِيثِ لِيُضِلَّ عَن سَبِيلِ اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًا ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ
और लोगों में बाज़ (नज़र बिन हारिस) ऐसा है जो बेहूदा क़िस्से (कहानियाँ) ख़रीदता है ताकि बग़ैर समझे बूझे (लोगों को) ख़ुदा की (सीधी) राह से भड़का दे और आयातें ख़ुदा से मसख़रापन करे ऐसे ही लोगों के लिए बड़ा रुसवा करने वाला अज़ाब है
7وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا وَلَّىٰ مُسْتَكْبِرًا كَأَن لَّمْ يَسْمَعْهَا كَأَنَّ فِي أُذُنَيْهِ وَقْرًا ۖ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
और जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो शेख़ी के मारे मुँह फेरकर (इस तरह) चल देता है गोया उसने इन आयतों को सुना ही नहीं जैसे उसके दोनो कानों में ठेठी है तो (ऐ रसूल) तुम उसको दर्दनाक अज़ाब की (अभी से) खुशख़बरी दे दे
8إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ جَنَّاتُ النَّعِيمِ
बेशक जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए उनके लिए नेअमत के (हरे भरे बेहश्ती) बाग़ हैं कि यो उनमें हमेशा रहेंगे
9خَالِدِينَ فِيهَا ۖ وَعْدَ اللَّهِ حَقًّا ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
ये ख़ुदा का पक्का वायदा है और वह तो (सब पर) ग़ालिब हिकमत वाला है
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अनुवाद — लुकमान 7

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Tuesday, August 18, 2026

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