Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- خَلَقَكُمْ: उसने तुम्हें पैदा किया।
- مَا تَعْمَلُونَ: और जो कुछ तुम करते हो (तुम्हारे कर्म और तुम्हारे बनाए हुए कार्य)।
तफसीर (व्याख्या):
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से मुख़ातिब होकर उन्हें उनकी ग़लतफ़हमी और भ्रम से बाहर निकालने के लिए यह सवाल किया। उन्होंने अपनी क़ौम से कहा: "क्या तुम उन मूर्तियों की इबादत करते हो जिन्हें तुम खुद अपने हाथों से तराशते हो?" फिर उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि अल्लाह ही वह है जिसने तुम्हें पैदा किया, और वही तुम्हारे कर्मों और तुम्हारे बनाए हुए कार्यों का भी ख़ालिक़ (रचयिता) है। यानी तुम्हारी सारी ताक़त, तुम्हारी क़ाबिलियत, तुम्हारे हाथों की गतिविधियाँ — सब कुछ अल्लाह ही की दी हुई हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, वह अल्लाह की मशीयत और उसकी ताक़त से ही करते हो।
इस आयत का मतलब यह है कि अल्लाह ने तुम्हें और तुम्हारे कामों को पैदा किया है। जब तुम खुद अपने कर्मों के मालिक नहीं हो, बल्कि तुम्हारे कर्मों का भी रचयिता अल्लाह है, तो फिर तुम उन मूर्तियों की पूजा क्यों करते हो जिन्हें तुमने खुद बनाया है? क्या यह अक्लमंदी की बात है कि इंसान अपने बनाए हुए पत्थरों को पूजे, और उस अल्लाह को भूल जाए जिसने उसे पैदा किया, उसे ज़िंदगी दी, उसे ताक़त दी, और उसे सोचने-समझने की क़ाबिलियत दी?
यह आयत हमें सिखाती है कि इबादत के लायक़ सिर्फ़ वही है जो पैदा करने वाला हो, और वह अल्लाह है। वही सबसे बड़ा रचयिता है। उसकी रचना में इंसान भी शामिल है और इंसान के कर्म भी शामिल हैं। इसलिए हमें अपनी ज़िंदगी के हर पल में अल्लाह की इबादत करनी चाहिए, उसी से मदद मांगनी चाहिए, और उसी के आगे सिर झुकाना चाहिए। जब हम यह समझ लें कि हमारी हर साँस, हर हरकत, हर अच्छा काम अल्लाह की देन है, तो हमारा दिल अपने रब की मुहब्बत से भर जाता है और हम उसकी इबादत में लज़्ज़त महसूस करते हैं।
यह आयत हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) की तरफ़ बुलाती है और शिर्क (बहुदेववाद) से बचाती है। यह हमें याद दिलाती है कि जो चीज़ें हम अपने हाथों से बनाते हैं, वे हमारी मदद नहीं कर सकतीं, न हमें नुक़सान पहुँचा सकती हैं। सिर्फ़ अल्लाह ही है जो हमें फ़ायदा पहुँचा सकता है और नुक़सान से बचा सकता है। इसलिए हमें अपनी सारी उम्मीदें अल्लाह पर रखनी चाहिए और उसी की इबादत करनी चाहिए। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है।
📜 आयत 94-98 — सूरा अस-साफ्फात
अनुवाद — अस-साफ्फात 96
सूरा अस-साफ्फात आयत 96 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : इबराहीम ने कहा (अफ़सोस) तुम लोग उसकी परसतिश करते हो…सूरा आयत 96/182 — सूरा अस-साफ्फात الصافات (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अस-साफ्फात सुनें, सूरा अस-साफ्फात अनुवाद, सूरा अस-साफ्फात mp3, सूरा अस-साफ्फात pdf. आयत 94–98. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अस-साफ्फात
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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