अस-साफ्फात · 99/182
अनुवाद उच्चारण — सूरा अस-साफ्फात
وَقَالَ إِنِّي ذَاهِبٌ إِلَىٰ رَبِّي سَيَهْدِينِ ۝٩٩
Wa qaala innee zaahibun ilaa Rabbee sa yahdeen
📖 हिंदी अर्थ
तो हमने (आग सर्द गुलज़ार करके) उन्हें नीचा दिखाया और जब (आज़र ने) इबराहीम को निकाल दिया तो बोले मैं अपने परवरदिगार की तरफ जाता हूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذَاهِبٌ (ज़ाहिबुन): जाने वाला, रवाना होने वाला
  • إِلَىٰ رَبِّي (इला रब्बी): अपने रब की ओर
  • سَيَهْدِينِ (सयह्दीन): वह मुझे मार्गदर्शन करेगा

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के उस ऐतिहासिक क़दम की तस्वीर पेश करती है जब उन्होंने अपने क़ौम के शिर्क और बुत-परस्ती से किनारा करते हुए अपने रब की राह में हिजरत (प्रवास) का फ़ैसला किया। यह वह मौक़ा था जब उन्होंने अपनी क़ौम को तौहीद (एकेश्वरवाद) की दावत दी, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह पर पूरा भरोसा करते हुए कहा: "मैं अपने रब की ओर जाने वाला हूँ, वह मुझे मार्गदर्शन करेगा।"

इसका मतलब यह है कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अपनी क़ौम की बस्ती छोड़कर उस जगह की ओर रवाना हुए जहाँ वे अपने रब की इबादत आज़ादी से कर सकें। उन्होंने अपना वतन, अपने अज़ीज़ और अपनी क़ौम को अल्लाह की राह में छोड़ दिया। यही वह जगह थी जहाँ से उन्होंने शाम (सीरिया/फ़िलिस्तीन) की तरफ हिजरत की। उनका यह क़ौल "सَيَهْدِينِ" (वह मुझे मार्गदर्शन करेगा) उनके अल्लाह पर अटूट भरोसे का इज़हार है — उन्हें पूरा यक़ीन था कि अल्लाह उन्हें वह रास्ता दिखाएगा जिसमें उनके दीन और दुनिया दोनों की भलाई होगी।

दावती पहलू और सबक:

यह आयत हम मुसलमानों के लिए एक ज़बरदस्त सबक़ है। जब हम अल्लाह की राह में कुछ क़ुर्बानी देते हैं — चाहे वह वतन छोड़ना हो, रिश्ते छोड़ना हो या दुनियावी माल छोड़ना हो — तो अल्लाह कभी निराश नहीं करता। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने सब कुछ छोड़ा और अल्लाह ने उन्हें न सिर्फ़ मार्गदर्शन दिया, बल्कि उन्हें अपना ख़लील (दोस्त) बनाया और उनकी नस्ल में नबी और रसूल पैदा किए।

आज के दौर में भी जब कोई मुसलमान अपनी जान, माल और वक़्त अल्लाह की राह में लगाता है, तो अल्लाह उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता। यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) ही असली ताक़त है। जब इंसान अल्लाह की ख़ातिर कुछ छोड़ता है, तो अल्लाह उसे उससे बेहतर चीज़ देता है। यही तो इस्लाम की रूह है — कि हम अपने रब की राह में निकलें, और उसके मार्गदर्शन पर पूरा यक़ीन रखें। अल्लाह कभी अपने बंदे को उसकी नीयत के बदले बेइज़्ज़त नहीं करता।



📜 आयत 97-101 — सूरा अस-साफ्फात

97قَالُوا ابْنُوا لَهُ بُنْيَانًا فَأَلْقُوهُ فِي الْجَحِيمِ
हालाँकि तुमको और जिसको तुम लोग बनाते हो (सबको) खुदा ही ने पैदा किया है (ये सुनकर) वह लोग (आपस में कहने लगे) इसके लिए (भट्टी की सी) एक इमारत बनाओ
98فَأَرَادُوا بِهِ كَيْدًا فَجَعَلْنَاهُمُ الْأَسْفَلِينَ
और (उसमें आग सुलगा कर उसी दहकती हुई आग में इसको डाल दो) फिर उन लोगों ने इबराहीम के साथ मक्कारी करनी चाही
99وَقَالَ إِنِّي ذَاهِبٌ إِلَىٰ رَبِّي سَيَهْدِينِ
तो हमने (आग सर्द गुलज़ार करके) उन्हें नीचा दिखाया और जब (आज़र ने) इबराहीम को निकाल दिया तो बोले मैं अपने परवरदिगार की तरफ जाता हूँ
100رَبِّ هَبْ لِي مِنَ الصَّالِحِينَ
वह अनक़रीब ही मुझे रूबरा कर देगा (फिर ग़रज की) परवरदिगार मुझे एक नेको कार (फरज़न्द) इनायत फरमा
101فَبَشَّرْنَاهُ بِغُلَامٍ حَلِيمٍ
तो हमने उनको एक बड़े नरम दिले लड़के (के पैदा होने की) खुशख़बरी दी
अस-साफ्फातकुरान सूची
182आयत
मक्कीअवतरण स्थान
99आयत

अनुवाद — अस-साफ्फात 99

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Thursday, October 1, 2026

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