अद-दुखान · 35/59
अनुवाद उच्चारण — अद-दुखान
إِنْ هِيَ إِلَّا مَوْتَتُنَا الْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنشَرِينَ ۝٣٥
In hiya illaa mawtatunal oolaa wa maa nahnu bimun shareen
📖 हिंदी अर्थ
कि हमें तो सिर्फ एक बार मरना है और फिर हम दोबारा (ज़िन्दा करके) उठाए न जाएँगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • إِنْ هِيَ إِلَّا – यह और कुछ नहीं, बस यही है।
  • مَوْتَتُنَا الْأُولَىٰ – हमारी पहली (और आखिरी) मौत, यानी दुनिया की मौत।
  • بِمُنشَرِينَ – दोबारा उठाए जाने वाले, जीवित किए जाने वाले।

तफसीर (व्याख्या):

ये आयत उन मुशरिकीन (बहुदेववादियों) का कथन बयान कर रही है जो आख़िरत (परलोक) को नकारते थे। वे कहते थे: "हमारी यह ज़िंदगी सिर्फ़ दुनिया की ज़िंदगी है, और इसके बाद सिर्फ़ एक ही मौत आएगी — वो पहली मौत जो हम सबको आनी है। इसके बाद कोई दोबारा जीवित होना, कोई हिसाब-किताब, कोई जज़ा या सज़ा नहीं है।" यानी वे पूरी तरह से क़यामत और आख़िरत के दिन को झुठला रहे थे, और यही उनका बुज़ुर्गों से विरासत में मिला अंधविश्वास था।

यह उनकी ज़रूरत से ज़्यादा मूर्खतापूर्ण बात थी, क्योंकि जिस अल्लाह ने पहली बार पैदा किया, वही दोबारा पैदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर (सक्षम) है। जिसने आसमान और ज़मीन को बनाया, उसके लिए मुर्दों को दोबारा ज़िंदा करना और भी आसान है। ये लोग अपनी इस बात से अल्लाह की क़ुदरत को भूल गए थे और सिर्फ़ अपनी नाकामयाब अक़्ल पर भरोसा कर रहे थे।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि मौत अंत नहीं है, बल्कि एक दरवाज़ा है जो हमें हमेशा की ज़िंदगी की तरफ ले जाता है। जो लोग आख़िरत को नकारते हैं, वे दरअसल अपनी ज़िम्मेदारी से भागना चाहते हैं, लेकिन अल्लाह ने हमें बताया है कि यह दुनिया इम्तिहान की जगह है, और एक दिन हम सब अपने अमलों का हिसाब देंगे। यही अक़ीदा (विश्वास) हमें नेक कामों की तरफ रागिब करता है और बुराई से रोकता है। अल्लाह की रहमत और इंसाफ़ का तक़ाज़ा है कि नेक लोगों को अच्छा बदला मिले और बुरे लोगों को उनकी सज़ा। इसलिए हमें इस दुनिया में अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों पर अमल करके उस दिन के लिए तैयारी करनी चाहिए, जब कोई माल या औलाद काम न आएगा, सिवाय उसके जो साफ़ दिल के साथ अल्लाह के पास आएगा।



📜 आयत 33-37 — अद-दुखान

33وَآتَيْنَاهُم مِّنَ الْآيَاتِ مَا فِيهِ بَلَاءٌ مُّبِينٌ
और हमने उनको ऐसी निशानियाँ दी थीं जिनमें (उनकी) सरीही आज़माइश थी
34إِنَّ هَٰؤُلَاءِ لَيَقُولُونَ
ये (कुफ्फ़ारे मक्का) (मुसलमानों से) कहते हैं
35إِنْ هِيَ إِلَّا مَوْتَتُنَا الْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنشَرِينَ
कि हमें तो सिर्फ एक बार मरना है और फिर हम दोबारा (ज़िन्दा करके) उठाए न जाएँगे
36فَأْتُوا بِآبَائِنَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
तो अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को (ज़िन्दा करके) ले आओ
37أَهُمْ خَيْرٌ أَمْ قَوْمُ تُبَّعٍ وَالَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ أَهْلَكْنَاهُمْ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِمِينَ
भला ये लोग (क़ूवत में) अच्छे हैं या तुब्बा की क़ौम और वह लोग जो उनसे पहले हो चुके हमने उन सबको हलाक कर दिया (क्योंकि) वह ज़रूर गुनाहगार थे
अद-दुखानकुरान सूची
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35आयत

अनुवाद — अद-दुखान 35

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Tuesday, August 18, 2026

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