अल-माइदा · 85/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
فَأَثَابَهُمُ اللَّهُ بِمَا قَالُوا جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْمُحْسِنِينَ ۝٨٥
Fa asaabahumul laahu bimaa qaaloo Jannnaatin tajree min tahtihal anhaaru khaalideena feehaa; wa zaalika jazaaa`ul muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
तो ख़ुदा ने उन्हें उनके (सदक़ दिल से) अर्ज़ करने के सिले में उन्हें वह (हरे भरे) बाग़ात अता फरमाए जिनके (दरख्तों के) नीचे नहरें जारी हैं (और) वह उसमें हमेशा रहेंगे और (सदक़ दिल से) नेकी करने वालों का यही ऐवज़ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَأَثَابَهُمُ اللهُ: तो अल्लाह ने उन्हें बदला दिया / प्रतिफल दिया।
  • جَنَّاتٍ: बाग़ (बहिश्त के बाग़)।
  • تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ: जिनके नीचे से नहरें बहती हैं।
  • خَالِدِينَ فِيهَا: उनमें हमेशा रहने वाले।
  • جَزَاءُ الْمُحْسِنِينَ: नेकी करने वालों का बदला।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने उन लोगों को, जिन्होंने ईमान लाने और सच्चाई को क़बूल करने का ऐलान किया और यह तमन्ना की कि वे नेक बंदों के साथ रहें, उनके इस क़ौल (बात) की वजह से बड़ा अज्र (इनाम) अता फ़रमाया। वह अज्र यह है कि उन्हें ऐसे बाग़ दिए गए जिनके महलों और दरख़्तों के नीचे नहरें बहती हैं। वे इन बाग़ों में हमेशा रहेंगे, कभी निकलेंगे नहीं और न ही उन्हें वहाँ से हटाया जाएगा। यह उन लोगों का बदला है जो अपने अक़वाल (बातों) और आमाल (कामों) में नेकी करते हैं, यानी जो सच्चे दिल से अल्लाह के हुक्म की पैरवी करते हैं और बिना किसी शर्त के हक़ के आगे सर झुका देते हैं। यह इनाम उनके ईमान, उनकी सच्चाई और उनके अच्छे किरदार का नतीजा है।


फ़ायदे (सबक़):

  1. सच्ची बात और नेक इरादे का इनाम: यह आयत सिखाती है कि जब इंसान सच्चे दिल से ईमान का इज़हार करता है और नेकी की चाहत रखता है, तो अल्लाह उसे ज़रूर उसका बदला देता है। अल्लाह किसी की नेक नीयत को बेकार नहीं जाने देता।
  2. जन्नत की हमेशगी: मोमिन के लिए सबसे बड़ी ख़ुशख़बरी यह है कि जन्नत की नेअमतें हमेशा रहने वाली हैं। वहाँ कोई ख़त्म होने वाला सुख नहीं, बल्कि हमेशा की राहत और सुकून है। यह चीज़ इंसान को दुनिया की फ़ानी (नाशवान) ख़ुशियों से बेहतर जन्नत की तरफ़ राग़िब करती है।
  3. नेकी का इनाम नेकी है: अल्लाह अपने नेक बंदों को सिर्फ़ उनकी नेकियों का बदला नहीं देता, बल्कि उन पर अपना फ़ज़ल (कृपा) भी करता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी ज़िंदगी में नेकी को अपना शिआर (तरीक़ा) बनाना चाहिए, चाहे दुनिया में उसका फ़ौरी नतीजा न भी दिखे।
  4. हक़ के आगे झुकना: जो लोग बिना किसी हिचकिचाहट के हक़ (सच्चाई) को क़बूल कर लेते हैं, अल्लाह उन्हें ऊँचा मक़ाम अता करता है। यह हमें सिखाता है कि हमें सच्चाई को क़बूल करने में देर नहीं करनी चाहिए, चाहे वह किसी भी तरफ़ से आए।
  5. अच्छे साथी की अहमियत: आयत में उन लोगों का ज़िक्र है जिन्होंने नेक लोगों के साथ रहने की तमन्ना की। यह हमें सिखाता है कि अच्छे लोगों की सोहबत (संगत) इंसान को जन्नत तक पहुँचाने का ज़रिया बन सकती है। इसलिए हमें नेक और सच्चे लोगों की संगत इख़्तियार करनी चाहिए।


📜 आयत 83-87 — अल-माइदा

83وَإِذَا سَمِعُوا مَا أُنزِلَ إِلَى الرَّسُولِ تَرَىٰ أَعْيُنَهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ مِمَّا عَرَفُوا مِنَ الْحَقِّ ۖ يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ
और तू देखता है कि जब यह लोग (इस कुरान) को सुनते हैं जो हमारे रसूल पर नाज़िल किया गया है तो उनकी ऑंखों से बेसाख्ता (छलक कर) ऑंसू जारी हो जातें है क्योंकि उन्होंने (अम्र) हक़ को पहचान लिया है (और) अर्ज़ करते हैं कि ऐ मेरे पालने वाले हम तो ईमान ला चुके तो (रसूल की) तसदीक़ करने वालों के साथ हमें भी लिख रख
84وَمَا لَنَا لَا نُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَمَا جَاءَنَا مِنَ الْحَقِّ وَنَطْمَعُ أَن يُدْخِلَنَا رَبُّنَا مَعَ الْقَوْمِ الصَّالِحِينَ
और हमको क्या हो गया है कि हम ख़ुदा और जो हक़ बात हमारे पास आ चुकी है उस पर तो ईमान न लाएँ और (फिर) ख़ुदा से उम्मीद रखें कि वह अपने नेक बन्दों के साथ हमें (बेहिश्त में) पहुँचा ही देगा
85فَأَثَابَهُمُ اللَّهُ بِمَا قَالُوا جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْمُحْسِنِينَ
तो ख़ुदा ने उन्हें उनके (सदक़ दिल से) अर्ज़ करने के सिले में उन्हें वह (हरे भरे) बाग़ात अता फरमाए जिनके (दरख्तों के) नीचे नहरें जारी हैं (और) वह उसमें हमेशा रहेंगे और (सदक़ दिल से) नेकी करने वालों का यही ऐवज़ है
86وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ
और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया यही लोग जहन्नुमी हैं
87يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ
ऐ ईमानदार जो पाक चीज़े ख़ुदा ने तुम्हारे वास्ते हलाल कर दी हैं उनको अपने ऊपर हराम न करो और हद से न बढ़ो क्यों कि ख़ुदा हद से बढ़ जाने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
अल-माइदाकुरान सूची
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मदनीRevelation
85आयत

अनुवाद — अल-माइदा 85

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Tuesday, August 18, 2026

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