अल-अनआम · 58/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
قُل لَّوْ أَنَّ عِندِي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِ لَقُضِيَ الْأَمْرُ بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ ۗ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِالظَّالِمِينَ ۝٥٨
Qul law anna `indee maa tasta`jiloona bihee laqudiyal amru bainee wa bainakum; wallaahu a`lamu bizzaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
(उन लोगों से) कह दो कि जिस (अज़ाब) की तुम जल्दी करते हो अगर वह मेरे पास (एख्तियार में) होता तो मेरे और तुम्हारे दरमियान का फैसला कब का चुक गया होता और ख़ुदा तो ज़ालिमों से खूब वाक़िफ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِ: जिस (अज़ाब) को तुम जल्दी माँग रहे हो।
  • لَقُضِيَ الْأَمْرُ: तो मामला (फ़ैसला) कर दिया जाता।
  • أَعْلَمُ بِالظَّالِمِينَ: ज़ालिमों (अत्याचारियों) को सबसे अच्छी तरह जानने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप इन मुशरिकों से कह दीजिए कि अगर मेरे पास वह अज़ाब होता जिसे तुम जल्दी माँग रहे हो (यानी अल्लाह की तरफ से मुझे उसे नाज़िल करने का अख़्तियार होता), तो मैं उसे तुम पर तुरंत नाज़िल कर देता और मेरे और तुम्हारे बीच का मामला ख़त्म हो जाता — यानी तुम पर अज़ाब आकर फ़ैसला हो जाता। लेकिन यह बात मेरे इख़्तियार में नहीं है, बल्कि यह अल्लाह ही के हाथ में है। वही जानता है कि ज़ालिमों (मुशरिकों) को कब तक मोहलत देनी है और कब उन्हें पकड़ना है। वह अपनी हिकमत के मुताबिक़ अज़ाब को मुल्तवी रखता है, क्योंकि वह ज़ालिमों के हाल को पूरी तरह जानता है और उनकी सज़ा का सही वक़्त भी उसे ही मालूम है।

फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह के नबी भी ग़ैब की बातों और अज़ाब के नाज़िल होने के मामले में पूरी तरह अल्लाह के हवाले हैं — यह तौहीद की तालीम है कि सारा इख़्तियार सिर्फ़ अल्लाह को है।
  2. अज़ाब में देरी अल्लाह की रहमत और हिकमत की वजह से होती है, ताकि लोगों को तौबा करने का मौक़ा मिले — यह अल्लाह की बंदों पर मेहरबानी है।
  3. ज़ालिमों को मोहलत मिलना उनके लिए बेहतरी नहीं है, बल्कि अल्लाह उन्हें उनकी सरकशी की वजह से पकड़ने से पहले मौक़ा देता है — इससे मुसलमानों को सब्र और भरोसे की तालीम मिलती है कि अल्लाह का फ़ैसला हर हाल में अदल पर होगा।
  4. यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि दुश्मनों की धमकियों और उनकी जल्दबाज़ी से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए — वही सबसे बेहतर जानने वाला और फ़ैसला करने वाला है।


📜 आयत 56-60 — अल-अनआम

56قُلْ إِنِّي نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ ۚ قُل لَّا أَتَّبِعُ أَهْوَاءَكُمْ ۙ قَدْ ضَلَلْتُ إِذًا وَمَا أَنَا مِنَ الْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मुझसे उसकी मनाही की गई है कि मैं ख़ुदा को छोड़कर उन माबूदों की इबादत करुं जिन को तुम पूजा करते हो (ये भी) कह दो कि मै तो तुम्हारी (नाफसानी) ख्वाहिश पर चलने का नहीं (वरना) फिर तो मै गुमराह हो जाऊॅगा और हिदायत याफता लोगों में न रहूँगा
57قُلْ إِنِّي عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَكَذَّبْتُم بِهِ ۚ مَا عِندِي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِ ۚ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۖ يَقُصُّ الْحَقَّ ۖ وَهُوَ خَيْرُ الْفَاصِلِينَ
तुम कह दो कि मै तो अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूं और तुमने उसे झुठला दिया (तो) तुम जिस की जल्दी करते हो (अज़ाब) वह कुछ मेरे पास (एख्तियार में) तो है नहीं हुकूमत तो बस ज़रुर ख़ुदा ही के लिए है वह तो (हक़) बयान करता है और वह तमाम फैसला करने वालों से बेहतर है
58قُل لَّوْ أَنَّ عِندِي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِ لَقُضِيَ الْأَمْرُ بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ ۗ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِالظَّالِمِينَ
(उन लोगों से) कह दो कि जिस (अज़ाब) की तुम जल्दी करते हो अगर वह मेरे पास (एख्तियार में) होता तो मेरे और तुम्हारे दरमियान का फैसला कब का चुक गया होता और ख़ुदा तो ज़ालिमों से खूब वाक़िफ है
59۞ وَعِندَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ ۚ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ ۚ وَمَا تَسْقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍ فِي ظُلُمَاتِ الْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ
और उसके पास ग़ैब की कुन्जियॉ हैं जिनको उसके सिवा कोई नही जानता और जो कुछ ख़ुशकी और तरी में है उसको (भी) वही जानता है और कोई पत्ता भी नहीं खटकता मगर वह उसे ज़रुर जानता है और ज़मीन की तारिक़ियों में कोई दाना और न कोई ख़ुश्क चीज़ है मगर वह नूरानी किताब (लौहे महफूज़) में मौजूद है
60وَهُوَ الَّذِي يَتَوَفَّاكُم بِاللَّيْلِ وَيَعْلَمُ مَا جَرَحْتُم بِالنَّهَارِ ثُمَّ يَبْعَثُكُمْ فِيهِ لِيُقْضَىٰ أَجَلٌ مُّسَمًّى ۖ ثُمَّ إِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ ثُمَّ يُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
वह वही (ख़ुदा) है जो तुम्हें रात को (नींद में एक तरह पर दुनिया से) उठा लेता हे और जो कुछ तूने दिन को किया है जानता है फिर तुम्हें दिन को उठा कर खड़ा करता है ताकि (ज़िन्दगी की) (वह) मियाद जो (उसके इल्म में) मुअय्युन है पूरी की जाए फिर (तो आख़िर) तुम सबको उसी की तरफ लौटना है फिर जो कुछ तुम (दुनिया में भला बुरा) करते हो तुम्हें बता देगा
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अनुवाद — अल-अनआम 58

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Tuesday, August 18, 2026

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