अल-हाक़्का · 39/52
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हाक़्का
وَمَا لَا تُبْصِرُونَ ۝٣٩
Wa maa laa tubsiroon
📖 हिंदी अर्थ
और जो तुम्हें नहीं सुझाई देती कि बेशक ये (क़ुरान)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَمَا لَا تُبْصِرُونَ: और जो चीज़ें तुम देख नहीं सकते — अर्थात वे मख़्लूक़ात (सृष्टियाँ) जो आँखों से ओझल हैं, जैसे फ़रिश्ते, जिन्न, आत्मा, अर्श, कुर्सी, और अल्लाह की वो क़ुदरत के नमूने जो इंसानी इदराक से परे हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी अज़ीम क़समों का सिलसिला जारी रखते हुए फ़रमाया कि मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की जिन्हें तुम देखते हो — जैसे सूरज, चाँद, सितारे, पहाड़, दरिया, ज़मीन, आसमान और तमाम दिखाई देने वाली मख़्लूक़ात — और उन चीज़ों की भी जिन्हें तुम देख नहीं सकते, जैसे अर्श, कुर्सी, फ़रिश्ते, जिन्नात, रूह, लौह-ए-महफ़ूज़, क़लम और वो सारी ग़ैबी हक़ीक़तें जो इंसानी आँखों से पोशीदा हैं।

ये क़समें बताती हैं कि अल्लाह तआला ने अपनी मख़्लूक़ात में दो क़िस्म की चीज़ें बनाई हैं — एक वो जो हम देख सकते हैं और दूसरी वो जो हमारी निगाह से छिपी हैं। दोनों ही अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हैं और दोनों गवाह हैं उस सच्चाई पर जो क़ुरआन बयान करता है।

इस क़सम का मक़सद ये है कि क़ुरआन करीम कोई इंसानी कलाम नहीं, बल्कि अल्लाह का कलाम है जो उसने अपने रसूल ﷺ पर नाज़िल किया। जिस तरह ये दृश्य और अदृश्य मख़्लूक़ात अल्लाह की पैदा की हुई हैं और उसकी क़ुदरत का सुबूत हैं, उसी तरह क़ुरआन भी अल्लाह की तरफ़ से है — उसमें कोई शक नहीं।

और देखो, जब अल्लाह तआला उन चीज़ों की क़सम खाता है जिन्हें हम देखते हैं और उनकी भी जिन्हें हम नहीं देखते, तो इसका मतलब ये है कि हमारी निगाहें जितनी चीज़ें देखती हैं और जितनी नहीं देखतीं — सब अल्लाह की आयतें हैं। ये हमें ग़ौर-ओ-फ़िक्र की दावत देती हैं कि हम इन पर ध्यान दें और अपने रब की क़ुदरत को पहचानें।

प्यारे भाइयो और बहनो! ये आयत हमें सिखाती है कि हमारे चारों ओर जो कुछ भी है — चाहे हम उसे देखें या न देखें — वह अल्लाह की बनाई हुई चीज़ें हैं और उसकी वहदानिय्यत (एकता) की गवाही देती हैं। जब हम सूरज को देखते हैं, चाँद को देखते हैं, अपने हाथों को देखते हैं — और जब हम उन चीज़ों के बारे में सोचते हैं जिन्हें हम नहीं देख सकते — तो हमारा ईमान और मज़बूत होना चाहिए कि इस कायनात का ख़ालिक़ एक ही है, वो अल्लाह है। और जिस तरह वो अपनी मख़्लूक़ात में सच्चा है, उसी तरह उसका कलाम — क़ुरआन — भी सच्चा है।

तो आओ, हम इस आयत से सबक़ लें कि अपनी आँखों से अल्लाह की निशानियाँ देखें, अपने दिल से उसकी ग़ैबी निशानियों पर ईमान लाएँ, और क़ुरआन को अपनी ज़िंदगी का रहनुमा बनाएँ — क्योंकि यही वो किताब है जो हमें दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाती है।



📜 आयत 37-41 — सूरा अल-हाक़्का

37لَّا يَأْكُلُهُ إِلَّا الْخَاطِئُونَ
तो मुझे उन चीज़ों की क़सम है
38فَلَا أُقْسِمُ بِمَا تُبْصِرُونَ
जो तुम्हें दिखाई देती हैं
39وَمَا لَا تُبْصِرُونَ
और जो तुम्हें नहीं सुझाई देती कि बेशक ये (क़ुरान)
40إِنَّهُ لَقَوْلُ رَسُولٍ كَرِيمٍ
एक मोअज़िज़ फरिश्ते का लाया हुआ पैग़ाम है
41وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍ ۚ قَلِيلًا مَّا تُؤْمِنُونَ
और ये किसी शायर की तुक बन्दी नहीं तुम लोग तो बहुत कम ईमान लाते हो
अल-हाक़्काकुरान सूची
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अनुवाद — अल-हाक़्का 39

सूरा अल-हाक़्का आयत 39 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जो तुम्हें नहीं सुझाई देती कि बेशक ये (क़ुरान)

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Tuesday, September 8, 2026

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