अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- تُفْسِدُوا: फ़साद फैलाना, बिगाड़ पैदा करना
- إِصْلَاحِهَا: उसका सुधार, उसे ठीक करना
- خَوْفًا: डर के साथ (अल्लाह की यातना से)
- طَمَعًا: लालच के साथ (अल्लाह की रहमत की उम्मीद)
- الْمُحْسِنِينَ: नेकी करने वाले, भलाई करने वाले लोग
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों को एक बहुत ही अहम नसीहत दे रहा है। वह फ़रमाता है कि ज़मीन में फ़साद न फैलाओ, उसे बिगाड़ो मत। यहाँ "ज़मीन में फ़साद" से मुराद सिर्फ़ ज़मीन को खराब करना नहीं है, बल्कि इसमें हर तरह की बुराई, ज़ुल्म, शिर्क, नाफ़रमानी और अल्लाह के हुक्मों की उल्लंघना शामिल है।
अल्लाह ने इस ज़मीन को इंसानों के लिए सुधारा है, उसमें रहने के लिए आरामदायक बनाया है, और सबसे बड़ी बात यह कि उसने अपने पैग़म्बरों को भेजकर और अपनी किताबें उतारकर इस ज़मीन को हिदायत की रोशनी से रोशन किया है। यही असली इस्लाह (सुधार) है। अब जब अल्लाह ने यह सुधार कर दिया है, तो हमारा फ़र्ज़ है कि हम इस सुधार को क़ायम रखें, और उसे बिगाड़ने का काम न करें।
फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और उसी से दुआ करो डर के साथ और उम्मीद के साथ।" यानी अल्लाह से माँगो, लेकिन दिल में दोनों चीज़ें हों — उसके अज़ाब से डर भी हो, और उसकी रहमत की उम्मीद भी हो। न इतना डरो कि उम्मीद ही खत्म हो जाए, और न इतनी उम्मीद करो कि डर ही न रहे। यही दोनों के बीच की कशिश इंसान को सही रास्ते पर चलाती है।
आख़िर में अल्लाह तआला एक बहुत ही खूबसूरत बशारत (खुशखबरी) देता है: "बेशक अल्लाह की रहमत नेकी करने वालों के बहुत करीब है।" यानी जो लोग नेकी करते हैं, भलाई करते हैं, अल्लाह की रहमत उनके साथ होती है, उन पर उसकी खास मेहरबानी होती है। यहाँ "क़रीब" (नज़दीक) का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है, जो बताता है कि अल्लाह की रहमत किसी दूर की चीज़ नहीं है, बल्कि उन लोगों के बहुत पास है जो नेकी करते हैं।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए नहीं है, बल्कि हमें इस ज़मीन को अच्छा बनाने में अपना हिस्सा अदा करना है। जब हम नेकी करते हैं, दूसरों के काम आते हैं, अल्लाह की इबादत करते हैं, तो हम असल में उस सुधार को आगे बढ़ा रहे हैं जो अल्लाह ने शुरू किया है। और जब हम ऐसा करते हैं, तो अल्लाह की रहमत हमारे साथ होती है, वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ता।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि दुआ सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल से करनी चाहिए — दिल में अल्लाह का खौफ़ भी हो और उसकी रहमत की उम्मीद भी। यही वह नुक़्ता है जहाँ से इंसान का रिश्ता अल्लाह से मज़बूत होता है। जो लोग इस तरह दुआ करते हैं और नेकी करते हैं, उनके लिए अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। आओ, हम सब मिलकर इस ज़मीन को अच्छा बनाने की कोशिश करें, और अल्लाह से उसी तरह दुआ करें — डर और उम्मीद के साथ — ताकि उसकी रहमत हम पर भी नाज़िल हो।
📜 आयत 54-58 — अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 56
सूरा अल-आराफ आयत 56 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (लोगों) अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके - चुपके दुआ…सूरा आयत 56/206 — अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-आराफ सुनें, अल-आराफ अनुवाद, अल-आराफ mp3, अल-आराफ pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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